Unbelievable! मुंबई का चमत्कारिक बच्चा..45 मिनट तक बिना धड़कन के भी रहा जिंदा!

पिछले सप्ताह अचानक काफी मुश्किलों भरी हो गई थी जब अचानक आराध्य का दिल लगभग 45 मिनट के लिए धड़कना बंद हो गया, वो भी जिस वक्त उसकी सर्जरी चल रही थी।

ये कहानी है कि धैर्य और जिंदगी की जिसके बारे में जानकर आप भी चमत्कार में विश्वास करने लगेंगे। मुंबई में तीन महीने के बच्चे जन्म से ही भीषण बीमारी से जूझ रहा था, बच्चे के दिल में छेद था।

पिछले सप्ताह अचानक काफी मुश्किलों भरी हो गई थी जब अचानक आराध्य का दिल लगभग 45 मिनट के लिए धड़कना बंद हो गया, वो भी जिस वक्त उसकी सर्जरी चल रही थी। कहना गलत नहीं होगा कि उसके पैरेंट्स तक ने उसके जिंदा बचने की उम्मीद छोड़ दी थी।

लेकिन कहते हैं ना कठिन परिस्थितियां आने पर दृढ इच्छाशक्ति वाले चुनौती का मजबूती से मुकाबला करते हैं। वाडिया अस्पताल के डॉक्टर्स ने भी कुछ ऐसा ही किया। उन्होंने बच्चे के दिल को आर्टिफिशयल मैकेनिकल सर्कुलेटरी सर्पोट सिस्टम से जोड़ा और बच्चे को नई जिंदगी दी। 26 घंटे के ऑपरेशन के बाद आराध्या का दिल बिल्कुल नॉर्मल चलने लगा और आराध्य बिल्कुल फिट हो गया।

डॉ. बिश्वा पांडा, हार्ट सर्जन ने रिपोर्टों को बताया कि इस पूरे ऑपरेशन में लगभग 26 घंटे लगे ताकि हृद्य सही तरीके से काम करने लगे। टीम के लिए ये काफी सुकून भरा था। हमने कृत्रिम तरीके से हृदय के फंक्शन को बनाए रखा। इस पूरे प्रक्रिया के दौरान मैं सिर्फ ये देख रहा था कि दिल से पूरे शरीर में रक्त का प्रवाह होता रहे।

आराध्य एक अल्प सुविधा प्राप्त परिवार से आता है जो धुले महाराष्ट्र के रहने वाले हैं। उसके पिता ने बताया कि जब वो गर्भ में था तभी इस बात का पता चल गया था। ऐसे बच्चों को ब्लू बेबी कहते हैं क्योंकि वो ऐसे दिल के साथ पैदा होते हैं जिनकी एक लिमिट तक फ्रेश ब्लड को पंप करने और ऑक्सीजन पहुंचाने की क्षमता रहती है।

बच्चे के पिता रविद्र वाग ने बताया कि आराध्य के दिल का ब्लड आउटलेट काफी छोटा था। डॉक्टर ने हमें कहा कि इस वजह से हार्ट ब्लड पंप नहीं कर पा रहा जिस वजह से शरीर को ऑक्सिजन नहीं मिल पा रहा। हमें बताय गया कि उसके बचने की संभावना कम थी इसलिए मुंबई आशा कि किरण लेकर आए थे।

गर्भ में इलाज...

डॉ पांडा ने साथ ही ये भी बताया कि आराध्य की समस्या का गर्भ में होने के दौरान ही पता चल गया था लेकिन उसकी मां ने डिलिवरी का रास्ता चुना।

डॉ पांडा ने ये भी कहा कि बहुत कम माएं होती हैं जो इस तरह की समस्या के बाद बच्चे को जन्म देना चाहती है। डिलिवरी के बाद बेबी की हालत बिगड़ गई क्योंकि ऑक्सिजन का लेवल 50-60 % ही था।

वाडिया अस्पताल के चीफ मिन्नी बोधवाला ने भी आराध्य और आराध्य जैसे कई बच्चों के इलाज में हर संभव मदद की।

बच्चे के पिता ने भी कहा किहम हमेशा अस्पताल और खासकर डॉ पांड के आभारी रहेंगे जिन्होंने हमारे बच्चे को नई जिंदगी दी। हम लोग गांव के रहने वाले बहुत साधारण लोग हैं। हम मेडिकल स्टाफ के भी आभारी है जिन्होंने हमारे बेटे को अपने बच्चे जैसा के समझा।

ब्लू बेबी सिन्ड्रोम क्या है ?

  • ब्लू बेबी सिन्ड्रोम (methemoglobinemia भी कहते हैं) बेबी को 6 महीनों के भीतर होता है। नवजात का अविकसित हृदय मेथेमोग्लोबिन रेडक्टेस ( methemoglobin reductase) नहीं प्रोड्यूस कर पाता जो एक oxygen-carrying molecule होता है।
  • जन्म से ही ऐसे हृद्य के कारण बेबी की तव्चा हल्की नीली रंग की हो जाती है। (सबसे अधिक पता होंठ और उंगलियों पर चलता है)क्योंकि खून में ऑक्सिजन की कमी होती है।
  • ब्लू बेबी सिन्ड्रोम के सामान्यत: लक्षण होता है कि बेबी आलसी हो जाते हैं, चिड़िचिड़ा जैसा करते हैं, ग्रे तव्चा, मुंह के आसपास नीली तव्चा पड़ जाती है। सांस लेने में भी समस्या होती है
  • सबसे अधक खतरा उन बच्चों को है जहा निजी पानी के स्त्रोत होते हैं क्योंकि इसमें नाइट्रेट अधिक मात्रा में होते हैं।

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Source: theindusparent

[Image courtesy: The Hindustan times]