Gestational surrogate माँ : भारत में गर्भ की Outsourcing

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28 अक्टूबर 2015 को भारत के स्वास्थ और परिवार कल्याण मंत्रालय ने उच्चतम न्यायलय में एक याचिका दायर की जिसमे विदेशिओं के लिए किराए की कोख या सरोगेसी को बंद करने की बात कही गयी है .

ऐसा करने से देश में 400 बिलियन डॉलर के बिज़नस को नियमित करने की बात की गयी है . एक ऐसी इंडस्ट्री जो ज्यादातर उन लोगों के द्वारा बनाई गयी है जो देश से बाहर रहते हैं . भारत सरस्कार व्यापारिक सरोगेसी का समर्थन नहीं करती है इसलिए इसका फैदा केवल वो लोग उठा पानेगे जो भारत में हैं और बच्चा न होने के कारण परेशान है .

लेकिन गर्भावधि सरोगेसी आखिर है क्या ? ये पारंपरिक सरोगेसी से कैसे अलग है ? और इससे किसी शादीशुदा जोड़े को क्या फाएदा होता है .

परिभाषा

गर्भावधि सरोगेसी एक कानूनी पहल है माता पिता बनने के इक्षुक लोगों और एक सरोगेट के बीच में . इसमें माता पिता बनने के इक्षुक जोड़े के स्पर्म और अंडे को सरोगेट के गर्भ में डाला जाता है IVF के द्वारा .

इस प्रक्रिया में IVF का इस्तेमाल किया जाता है ताकि माँ बनने को इक्षुक स्त्री के अंडे को भ्रूण बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिसे किसी दूसरी महिला के गर्भ में दाल दिया जाता है . theIndusparent.com ने मुंबई के मालपानी फर्टिलिटी के संस्थापक डॉ मलोअनी से बात की और उन्होंने बताया की “ हालांकि अंडे और स्पर्म दोनों की इक्षुक माँ बाप के होते हैं लेकिन कई केस में अंडे और स्पर्म डोनर के साथ इक्षुक माँ बाप के गमेटेस के साथ भी इस्तेमाल किया जा सकता है .

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मुझे गर्भावधि सरोगेसी क्यों करानी चाहिए ?

गर्भावधि सरोगेसी चुनने के कई कारण हो सकते हैं . अगर आपमें निम्नलिखित में से कोई भी समस्या है तो आप गर्भावधि सरोगेसी को चुन सकते हैं :

  • आपके पास गर्भाशय नहीं है
  • अगर आप गर्भवती नहीं हो पारही हैं
  • अगर आपका फैलोपियन ट्यूब खराब हो गया हो
  • आपके अंडाशय में कोई समस्या हो
  • आपके हॉर्मोन में बहुत ज्यादा उतार चढ़ाव होते हों
  • आपकी ग्रीवा ठीक न हो
  • आपका कई बार गर्भपात हो गया हो
  • IVF की प्रक्रिया फेल हो गयी हो
  • आप दिल के दौरे या हाई ब्लड प्रेशर की बिमारिओं की गंभीर अवस्था में हों
  • अगर आपको ब्रैस्ट कैंसर हो या इसका इतिहास रहा हो
  • आपके गर्भाशय का आकार ठीक न होने के कारण भ्रूण उसमे इम्प्लांट नहीं किया जा सकता हो

भारत में गर्भावधि सरोगेसी के कानून

 आप सरोगेट खुद ढूंढे या किसी एजेंसी के द्वारा आपको सबसे पहले कुछ कानूनी जटिलताओं के बारे में जान लेना चाहिए . फिर भी अगर आप गर्भावधि सरोगेसी  के साथ जाना चाहती हैं तो इसमें समय , पैसा और बहुत ज्यादा धैर्य की जरूरत है . कानूनन व्यापारिक सरोगेसी भारत में 2002 में आई . अभी तो पार्टी और असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेकनिक (ART) के बीच कानूनी मसौदे पर हाश्ताक्षर कर देने भर से ही गर्भावधि सरोगेसी की नीव रख दी जाती है . इंडियन कौंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (ICMR) के द्वारा बनाया गया कानूनी मसौदा कहता है :

  • सरोगेट माँ किसी भी तरह से बच्चे से बायोलॉजिकली जुडी नहीं होनी चाहिए . भारतीय कानून केवल इक्षुक माँ को ही बच्चे की माँ स्वीकारता है .
  • बच्चे के बिर्थ सर्टिफिकेट पर इक्षुक माँ बाप के नामा होंगे सरोगेट के नहीं
  • डोनर को गोपनीय रखा जाना चाहिए और अपना स्पर्म डोनेट करने से पहले कानूनी रूप से वो बच्चे पर किसी भी तरह से हक़ न जताए इसका प्रावधान होना चाहिए .
  • जन्म से पहले और बाद में किसी भी तरह के कागजात बनवाने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि ये कसी व्यक्ति का निजी मामला है
  • इस कॉन्ट्रैक्ट में सरोगेट के मेडिकल, प्रसव IVF के खर्च आदि का वहां इक्षुक माँ बाप ही करेंगे
  • बच्चे के लिंग की जांच प्रतिबंधित है
  • इस कानून के अन्दर अगर बच्चा 18 साल का हो जाए तो उसे अपने सरोगेट माँ के बारे में जानने का अशिकार है हालांकि इक्षुक माता पिटा ये बताने के लिए बाध्य नहीं किये जा सकते
  • ART एक्ट 2008 सेक्शन 34(11) के मुताबिक इक्षुक माता पिटा को बच्चे की जिम्मेदारी लेनी ही होगी चाहे बच्चा शारीरिक या मानसिक रूप से विकृत ही क्यों न हो .

 

ऊपर बताये गए सभी नियम किसी भी सरोगेट माँ को और इक्षुक माता पिता को यहाँ तक की होने वाले बच्चे को किसी भी तरह के फ्रॉड से बचाते हैं .

दिल्ली की शांता फर्टिलिटी सेंटर फर्टिलिटी कंसलटेंट और मेडिकल डायरेक्टर डॉ अनुभा सिंह बताती हैं “ हमें ये नहीं भूलना चाहिए की गर्भावधि सरोगेसी की जरूरत तब पड़नी चाहिए जब प्राकृतिक रूप से बच्चा न हो रहा हो “ 

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गर्भावधि सरोगेसी की प्रक्रिया

हालांकि आप इक्षुक माता पिता होते हुए बच्चे को गर्भ में नहीं रखेंगी लेकिन आप इस पूरी प्रक्रिया में सम्मिलित होंगी . सरोगेट के मेडिकल खर्च के साथी साथ आपको उसका मेडिकल इंश्योरेंस , आने जाने का खर्च कानूनी प्रक्रियाओं का खर्च आदि उठाना होगा .

आप सरोगेट चुनने की प्रक्रिया में पर्तिभागी की स्क्रीनिंग का भी हिस्सा होंगे .डॉ सिंह बताती हैं “ इस प्रक्रिया की शुरुवात फर्टिलिटी काउंसलिंग के साथ होती है और फिर सरोगेट में किसी संभावित संक्रमण की जांच की जाती है , गर्भाशय की जांच की जाती है, ब्लड प्रेशर , हीमोग्लोबिन की मात्रा की भी जांच की जाती है .डॉ सिंह निम्नलिखित प्रक्रियाओं के बारे में बताती हैं :

  • फर्टिलिटी काउंसलिंग: ये गर्भावधि सरोगेसी का पहला हिस्सा है . इस दौरान गर्भावधि सरोगेसी के सभी अच्छे और बुरे पहलुओं के बारे में बात की जाती है और मामले को अच्छे से समझा जाता है . डॉ सिंह बताती हैं की इक्षुक माता पिता को समझना चाहिए की इस तरीके से होने वाले बच्चे से उनका रिश्ता कैसा रहेगा ?
  • गर्भावधि सरोगेसी की शुरुवात : ये गर्भावधि सरोगेसी  का पहला स्तर होता है जहाँ इक्षुक माता पिता एक सरोगेट माँ की तलाश करते हैं . ये आप निजी रूप से भी कर सकते हैं या किसी एजेंसी के द्वारा भी करवा सकते हैं . “ हम ज्यादातर 24 से 30 साल की उन महिलाओं का ही चयन करते हैं जिन्होंने सफलतापूर्वक पहले भी बच्चों को जन्म दिया हो . इससे जच्चा बच्चा दोनों के स्वास्थ्य रहने की संभावना बढती है “
  • सरोगेट की स्क्रीनिंग : ये एक और महत्वपूर्ण स्टेप है जहाँ सरोगेट में हीमोग्लोबिन, रक्त चाप, संक्रमण , हाइपरटेंशन या डायबिटीज आदि की जांच की जाती है . सरोगेट माँ को आम तौर पर एक प्री नेटल टेस्ट से गुजरना पड़ता है . डॉ सिंह बताती हैं “ उन्होंने अल्ट्रासाउंड और कई ब्लड टेस्ट से गुजरना पड़ता है ताकि ये पता लगाया जा सके की उनका शरीर गर्भवती होने के लिए तैयार है या नहीं .
  • कानूनी कॉन्ट्रैक्ट पर हाश्ताक्षर : ये सरोगेसी का अंतिम पडाव होता है . इसमें ICMR  के नियमों के तहत दोनों पार्टी कानूनी दस्तावेजों पर हाश्ताक्षर कर देते हैं .

गर्भावधि सरोगेसी का प्रत्यारोपण

माता पिता बनने के लिए अगली प्रक्रिया है IVF . एक IVF की प्रक्रिया पूरा हिओने में करीब 4 से 6 हफ्ते लेती है . इसमें भ्रूण को सरोगेट के गर्भ में डाला जाता है . डॉ शान्ता बताती है की इस प्रक्रिया को कैसे पूरा किया जाता है :

  • ऋतुचक्र को समान करना : सरोगेट माँ और इक्षुक माँ को दवाई दी जाती है जिससे की उन दोनों का ऋतुचक्र एक सामान हो जाए .ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि सरोगेट माँ के गर्भाशय की लाइनिंग इक्षुक भ्रूण को सँभालने लायक बन जाए .
  • अंडे का बनना : अब इक्षुक माँ को दवाई दी जाती है जिससे उनके अंडाशय से अंडे निकलने शुरू हों .
  • फर्टिलाइजेशन : एक बार अंडे फर्टिलाइज हो जाए तो मेडिकल प्रक्रियों द्वारा उसे निकाल लिया जाता है .इसी तरह इक्षुक पिता अपना स्पर्म देता है जिससे लैब में अंडे के साथ फर्टिलाइज किया जा सके .
  • भ्रूण का ट्रान्सफर: इस प्रक्रिया में भ्रूण को सरोगेट के गर्भ में रखा जाता है .
  • प्रत्यारोपण और गर्भ : एक बार अण्डों का प्रत्यारोपण सरोगेट के गर्भाशय में जाए तो वो गर्भवती होने के लिए तैयार होती है .

इस पुरे प्रक्रिया को पूरा होने में कई महीने यहाँ तक की कई साल लग सकते हैं . हालांकि कई बार 1 से 3 बार IVF साइकिल को पूरा करना पद सकता है .

गर्भावधि सरोगेसी की सफलता का दर

एक बार IVF हो जाने के बाद आपके बच्चे काजन्म ओउरी तरह सरोगेट के बच्चा जानने की कश्मता पर ही निर्भर है .  डॉ सिंह बताती हैं “ ये ज्यादातर सरोगेट के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है . अगर उसकी स्क्रीनिंग और जांच सही हुई है और वो स्वस्थ है तो प्रक्रिया अवश्य ही सफल होती है”

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गर्भावधि सरोगेसी के रिस्क

  • सरोगेट परेशानिओं से गुजरती है जैसे की साधारण गर्भावस्था में होता है .
  • गर्भावधि सरोगेसी कानूनी रूप से जटिल और महंगा है . भारत में इसकी कीमत 11 से 15 लाख के बीच में है .
  • हो सकता है आपका परिवार आपकी स्थिति नहीं समझे और आपको उन्हें समझाना पड़े .
  • विशेषज्ञों के मुताबिक म्भार्ट में ऐसा नहीं होता है लेकिन अगर सरोगेट माँ बच्चा देने से इनकार कर दे तो कानूनी पचड़ों में पद सकते है

दिल्ली के शांता फर्टिलिटी सेंटर की डॉ सिंह  बताती हैं “ये सभी मुख्य रिस्क है जो गर्भावधि सरोगेसी  के दौरान होते हैं . हालांकि भारत में कोई भी कपल इस विकल्प को तभी चुनता है जब उसके सारे दुसरे विकल्प खत्म हो जाते हैं “

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