SHOCKING..2018 से ICSE बोर्ड पांचवी और आठवीं कक्षा की लेगा बोर्ड परीक्षा

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इंडियन सर्टिफिकेट ऑफ सेकेंडरी एज्युकेशन (ICSE) का कहना है कि पांचवीं और आठवीं कक्षा के विद्यार्थियों को 2018 से बोर्ड परीक्षा देनी होगी।

इसके पहले कि आप ये सोचें कि ये फर्जी खबर है मैं आपको बता दूं कि आप जो भी पढ़ने जा रहे हैं ये सही है। इंडियन सर्टिफिकेट ऑफ सेकेंडरी एज्युकेशन (ICSE) का कहना है कि पांचवीं और आठवीं कक्षा के विद्यार्थियों को 2018 से बोर्ड परीक्षा देनी होगी।

काउंसिल के सीईओ गैरी अराथुन ने कोलकाता में एक बयान जारी करते हुए कहा कि बोर्ड की परीक्षाएं जरूर होंगी लेकिन इसमें पास फेल का टैग नहीं दिया जाएगा।
students in a classroom SHOCKING..2018 से ICSE बोर्ड पांचवी और आठवीं कक्षा की लेगा बोर्ड परीक्षा

ये सिर्फ एक कुछ दिनों के लिए शुरू किया गया है ताकि हम बच्चों की प्रगति देख सकें।पांचवी और आठवीं कक्षा में बोर्ड परीक्षाओं के पेपर दूसरे स्कूल के शिक्षक देखेंगे जैसा दसवीं के विद्यार्थियों के साथ होता है। ये प्रयोग 2018 से शुरू किया जाएगा।

उन्होंने मीडिया से ये भी कहा कि बोर्ड ने ये भी निर्णय लिया है कि तीन अनिवार्य विषय भी बच्चों के लिए निर्धारित किए जाएंगे जिसमें संस्कृतयोगा और परफॉर्मिंग आर्ट्स होंगे।ये विषय कक्षा से के विद्यार्थियों के लिए किया जाएगा। संस्कृत पांचवी से आठवीं कक्षा के विद्यार्थी पढ़ेंगे। उन्होंने साथ ही ये भी कहा कि ICSEस्कूलों को से लेकर 10वीं कक्षा तक एकसमान सिलेबस फॉलो करना होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि ये अच्छा आइडिया नहीं है।

पोद्दार एज्युकेशन की प्रेसिडेंट स्वाति पोपट का मानना है कि इससे विद्यार्थियों का कैसे फायदा होगा? हमारे शिक्षा बोर्ड को समझने की जरूरत है कि शिक्षकों के परफॉर्मेंस को देखने के लिए बच्चों की परीक्षा लेना ना बच्चों के लिए अच्छा है और ना पैरेंट्स के लिए। परीक्षाओं की शिक्षा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फेल हो चुकी है। इसलिए फिनलैंड और अब सिंगापुर PISA में बेहतर स्कोर कर रहे हैं क्योंकि उन्होंने बच्चों को पढ़ाने का तरीका बदला है।परीक्षा से कभी विद्यार्थियों का भला नहीं हुआ। टेस्ट से पहले 10 रैंक में आने वाले बच्चों के लिए तो ठीक है लेकिन बाकी बच्चों की अनदेखी हो जाती है जबकि वो भी इंटेलीजेंट होते हैं।

श्रीमती वत्स ने theindusparen से बातचीत में कहा कि हमारी शिक्षा बोर्ड को बदलाव की जरूरत है।जरूरत है कि ‘परीक्षा’ की अवधारणा से आगे बढ़ें। परीक्षा से सिर्फ याददाश्त का पता चलता है।

मुंबई बेस्ड प्रेरणा पांडे विज्ञान की लेखिका हैं और दो बच्चो की मां भी है। उनका कहना है कि मुझे परीक्षाओं से सख्त नफरत है। मुझे लगता है कि परीक्षा की तनाव की वजह से बच्चे कम उम्र में ही हतोत्साहित होते हैं।उन्हें कम उम्र मे सफल और असफल की कैटेगरी में शामिल किया जाता है।

श्रीमती वत्स का भी यही मानना है कि ये निर्णय सिर्फ पैरेंट्स और बच्चों दोनों को चिंतित करेगा।

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Podar Education Network President Swati Popat Vats with the kids of Podar Jumbo Kids

वत्स का कहना है कि ऐसे कम उम्र में बोर्ड की परीक्षाओं से दो परिणाम देखने को मिलेंगे – पैरेंट्स इससे इतने अधिक चिंतित हो जाएंगे कि आखिरकार उनके साथ मनोबल गिरने की समस्या होगी इसके बाद बच्चे और पैरेंट्स दोनों ही डिप्रेशन में जाएंगे। फिर पैरेंट्स बच्चों को कोचिंग क्लास में भेजेंगे और इससे आखिरकार फायदा कोचिंग क्लास वालों को होगा है।

मुंबई की रहने वाली देबोलीना राजा पांचवीं और जूनियर केजी की बच्ची की मां हैं और उनका मानना है कि भारतीय संस्थाएं पहले से ही काफी दबाब में हैं।

उनका कहना है कि एक पैरेंट के तौर पर मेरे पास कहने के लिए सिर्फ एक शब्द है मूर्खतापूर्ण। भारत में हम पहले ही देख रहे हैं कि बच्चों पर काफी प्रेशर है और इसका कारण भारतीय शिक्षा नीति है। भले ये निर्णय लिया गया हो कि पांचवीं और आठवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाओं का पास और फेल से कोई लेना देना नहीं होगा लेकिन पैरेंट्स बोर्ड‘ शब्द सुनते ही बच्चो पर दबाब डालेंगे। यह मूल्यांकन प्रक्रिया ना बनाकर दबाब देने की प्रक्रिया बनकर रह जाएगी वो भी जब बच्चे तीसरी चौथी कक्षा में होंगे तभी से उन्हें नहीं छोड़ा जाएगा” देबोलिना राजा का मानना है कि बच्चों पर पहले ही अधिक पढ़ने और सीखने का दबाब है जो कि समझने और सीखने का असल में होना चाहिए।

साथ ही देबोलीना राजा ने theindusparent ये भी कहा कि पांचवी से आठवीं कक्षा के छात्रों के लिए संस्कृत को अनिवार्य विषय बनाना भी बड़ी गलती है। बच्चों को कम उम्र में नई भाषा का ज्ञान देने की शुरूआत करनी चाहिए। इससे वो चीजें जल्दी समझ पाएंगे। इस उम्र में नई भाषा सीखना उनके लिए दबाब का कारण होगा। मुझे माफ कीजिए लेकिन ऐसा लगता है कि ICSE हमारी शिक्षा नीति बच्चों का जो भी थोड़ा बहुत बचपन बचा हुआ है वो छीनना चाहती है।

वहीं श्रीमती वत्स का योगा को अनिवार्य शिक्षा में जोड़े जाने से काफी खुश हैं। उन्होंने कहा कि मैं इस बात से खुश हूं कि पढ़ाई में योगासंस्कृत और परफॉर्मिंग आर्ट्स शामिल किया जा रहा है

Source: theindusparent