क्या खसरा घातक है ?जानिये इससे जुड़े जटिलताओं और जोखिमों के बारे में .

इस साल जून में गुजरात के कच्छ में मीठी रोहर गाँव में खसरा की बिमारी फ़ैल गयी .करीब 50 बच्चों में ये बिमारी फैली जिसने वहां के मेडिकल एक्सपर्ट को बहुत बड़ा झटका दे दिया . हालांकि 2012 के मुकाबले स्थिति अच्छी थी जहाँ 18,668 मामले दर्ज किये गए थे .

वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन के मुताबिक दक्षिणी एशिया और सब सहारा अफ्रीका के बाद भारत का स्थान दुसरा रहा . इस वजह से दक्षिणी पूर्वी एशिया के वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन ने 2020 तक खसरे की बिमारी को पूरी तरह से मिटाने का लक्ष्य रखा . तो आइये जानते हैं की खसरे को इतना खतरनाक कैसे माना जाता है और ये होता कैसे है ?

परिभाषा

खसरे को रुबोला भी कहा जाता है जो बहुत ही खतरनाक और गंभीर बिमारी मानी जाती है .ये इतना खतरनाक है की खसरे की बिमारी से ग्रसित किसी व्यक्ति के साथ कुछ समय के लिए एक कमरे में रहने भर से या चेहरे के सामने रहने भर से ही इसका वायरस बहुत तेंजी से फैलता है . इसके लक्षणों में शरीर पे रेशेश हो जाना , बुखार , नाक बहना , खांसी आदि जैसे चीजें आती हैं .

खसरे के लक्षण

इसके लक्षण वायरस के हमले के 10 से 14 दिन बाद दिखने शुरू होते हैं . ये हैं कुछ लक्षण :

  • बुखार
  • नाक  का बहना
  • सुखी खांसी
  • आँखों का लाल हो जाना
  • मुह के भीतर सफ़ेद रंग के लाइन बन जाना
  • गले में खरास
  • लाल रेशे हो जाना , चेहरे से शुरू होते हुए सारे शरीर में फ़ैल जाना

खसरे की अवस्था

खसरे की बिमारी करीब 2 से 3 हफ़्तों तक रहती है

खसरा की गैर विशिष्ट लक्षण

ये वो लक्षण हैं जो ज्यादातर बिमारिओं के लक्षण से मेल खाते हैं . इनकी शुरुवात नाक बहने, सुखी खांसी , जलती आँखों के साथ होती है .

रेशेश और बिमारी

रेशेश की शुरुवात इन गैर विशिष्ट लक्षणों के शुरू होने के बाद ही होती है . रेशेश की शुरुवात सर से होती है जो चेहरे , कान के पीछे के हिस्से से होते हुए सारे शरीर में फ़ैल जाती है . रेशेश के साथ साथ 40 से 41 डिग्री तक के बुखार  भी हो सकते हैं

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कारण

खसरा पैरामिक्सोवायरस के कारण होता है . यह बच्चे के नाक में पनपता है और बीमार बच्चे के गले में भी . यही कारण है की बच्चे के छींकने आदि के कारण ये वायरस बहुत तेज़ी से आस पास मौजूद लोगों में फैलता है .इससे बचना आसान है अगर छींकते वक़्त या खांसते वक्त मुँह और नाक को हाथों से ढक लिया जाए .

फैलाव

एक बच्चा 8 दिन के बाद इस बिमारी को फैलाने लगता है . इसका मतलब रेशेस होने के 4 दिन पहले . सबसे खतरनाक समय तब होता है जब बच्चे को बुखार भी हो . जिनकी प्रतिरोधक क्षमता कम होती है उनके द्वारा इस वायरस के फैलने की संभावना और बढ़ जाती है .

रिस्क फैक्टर

  • MMR (measles, mumps, rubella) के टीके न लगवाना
  • ऐसे देशों की यात्रा पे जाना जहाँ हाल ही में में कोई प्राकृतिक आपदा आई हो
  • स्वास्थ सम्बन्धी इंफ्रास्ट्रक्चर मके तबाह होने से वायरस का फैलना
  • विटामिन ए की कमी होना एक आम कारण है इस वायरस के फैलने के पीछे

कठिनाइयाँ

  • डायरिया और सुनने की क्षमता में कमी
  • ब्रोंकाइटिस
  • लैरिनजीटीस
  • निमोनिया
  • दिमाग में सुजन
  • प्लेटलेट का कम होना
  • गर्भ से जुडी समस्याएं जैसे की गर्भपात आदि

जांच और निदान

डॉक्टर इस बिमारी का पता इसके कारण होने वाले रेशेस से लगा सकते हैं . हालांकि रक्त की जांच जरुरी है .

इलाज़ और दवाइयां

क्योंकि खसरा वायरस के कारण होता है इसीलिए करीब 10 दिनों तक ये रहता ही है .

निर्धारित दवाइयां:

  • बुखार के लक्षण से बचने के लिए Acetaminophen, ibuprofen या naproxen दिया जा सकता है
  • एस्पिरिन का सेवन बिलकुल न करें
  • बैक्टीरिया से बचने के लिए एंटीबायोटिक्स दी जा सकती है अगर बच्चा कान में दर्द और निमोनिया से परेशान है तो
  • विटामिन ए लेते रहना चाहिए

खसरे से ग्रसित बच्चे की जांच करते रहना चाहिए क्योंकि खसरा कभी भी बड़ा रूप लेकर बच्चे को परेशानी में डाल सकता है .

घरेलु नुस्खे

  • बीमार बच्चे को एक कमरे तक ही सिमित रखें
  • दूसरों के संपर्क में आने से बचें
  • हुमिडिफायर का इस्तेमाल करें
  • बच्चे को अगर तेज रौशनी से परेशानी है तो कमरे की लाइट धीमी कर दें . टीवी देखने या स्मार्टफ़ोन आदि के इस्तेमाल करने से बचें .
  • बच्चे को आराम करने के लिए प्रेरित करें

नोट : क्योंकि खसरा बहुत तेजी से फैलता है इसीलिए बीमार बच्चे को मास्क पहना दें

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बचाव

MMR vaccine के टीके लगवाएं जो 12 से 15 महीने की उम्र में लगता है और फिर 4 से 6 साल की उम्र में .

माँ के द्वारा मिली प्रतिरोधक क्षमता के कारण बच्चे को ये बिमारी शुरू के 6 महीनों में नहीं होती है . अगर ज्यादा जरुरी हो तो 11 महीने के बच्चे को भी ये टीका लगाया जा सकता है MMR से बचाव के बाद .

 MMR टीके किसे नहीं लगवाने चाहिए ?

  • गर्भवती महिला
  • बच्चे जिन्हें ट्यूबरक्लोसिस हो
  • जिनके कैंसर का इलाज़ चल रहा हो
  • जिन्हें जेलेटिन या निओमाइसिन से एलर्जी हो
  • जिनके शरीर में प्लेटलेट की कमी हो
  • जिन्हें हाल ही में खून चढ़ाया गया हो
  • जिन्हें कोई और टीका  पिछले 4 हफ़्तों में लगाया गया हो

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