आईपैड से दूर रहने का समय आ गया है : स्क्रीन पर देर तक काम करने से होते हैं नुकसान

आजकल हर बच्चा अपने हाथों में मोबाइल लेकर उसकी रौशनी में घंटों ताकता रहता है । यहाँ तक की कम उम्र में बच्चों को ऐसे गैजेट आदि देने का रिवाज़ सा शुरू हो चला है ।

मनोवैज्ञानिक सूए पामर बताते हैं "मैं आने वाले वक़्त में युवाओं के जीवन में गैजेट की संभावनाओं को पहले ही भांप चुका था" “मैं तो बल्कि इसकी तेज गति को देखकर हैरान हूँ । हैरान हूँ ये देखकर की कैसे छोटे छोटे बच्चे भी इस लत के शिकार होते जा रहे हैं और कैसे बड़े लोग अपनी वर्चुअल पर्सनालिटी से जपहचाने जाने लगे हैं।"

उन्होंने अपनी एक किताब "टॉक्सिक चाइल्डहुड"में कम उम्र में ज्यादा देर तक मोबाइल स्क्रीन पर देखते रहने और फेसबुक की लत को लेकर चेतावनी भी जारी की थी। हालाँकि किताब में बताई गयी बातें लोग मान नही रहे हैं लेकिन इसकी सख्त जरूरत अब दिखाई पड़ने लगी है ।
उन्होंने अपने एक साथी के साथ किये एक रिसर्च में मोटापा, नींद संबंधी विकार, आक्रामकता, गिरते सामाजिक कौशल, अवसाद और शैक्षणिक विकृतियों का ज्यादा देर तक स्क्रीन देखने के बीच  संबंध स्थापित किया।सूए अपने डेली ब्लॉग में बताती हैं "ये मात्र संयोग नहीं है की स्मार्टफोन के मार्केट में उछाल और लोगों के स्वास्थ्य का स्तर का गिरना एक साथ चल रहा हो । और ये हर उम्र के लोगों के साथ हो रहा है।"
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अब इससे होने वाले नुकसान में केवल स्वास्थ्य संबंफि बातें ही नहीं हैं बल्कि वो बातें भी हैं जो वो असल ज़िन्दगी में मिस कर जाते हैं, जैसे लोगों से मिलना, बातचीत करना आदि।  "असली खेलों के लिए आज बच्चों के पास बहुत ही कम ऑप्शन्स हैं । अब वो बाहर दोस्तों के साथ सोशल होकर अपने एक्सपीरियंस नहीं बनाते हैं बल्कि वर्चुअल दुनिया ने ही जीते हैं ।

रियल लाइफ में गेम खेलने के अनगिनत फायदे हैं जिनमें, प्रॉब्लम सॉल्विंग स्किल्स, नेतृत्व, बचाव, भावनात्मक विकास आदि भी शामिल हैं । सूए आगे बताती हैं की अगर बचपन में रियल लाइफ एक्टिविटी में बच्चों को शामिल नहीं किया जाएगा तो इसे बुरे परिणाम आगे जाकर बच्चों में देखने को मिलेंगे। इससे बचने के लिए बच्चों को जितना हो सके प्राकृतिक व्यवस्था से जोड़े रखना बहुत ज्यादा जरूरी है।

“The American Academy of Paediatrics के मुताबिक बच्चों के लिए दिन में 2 या ज्यादा से ज्यादा 3 घंटे ही आईपैड की स्क्रीन पर देखना चाहिए। ""ये न सिर्फ ज्यादा स्क्रीन टाइम और अटेंशन डिसऑर्डर के बीच सम्बन्ध स्थापित करता है बल्कि ये दिमाग से एक स्वस्थ शरीर के लिए जरूरी एक्टिविटी की जरूरत की समझ भी खत्म कर देता है।"

आज के समय में हर किसी को चाहे वो बच्चे ही क्यों न हो थोड़ी बहुत टेक्नोलॉजी से जुड़े रहना जरुरी है क्योंकि दुनिया ऐसे ही चल रही है । इस बात को मानने में कोई समस्या नहीं है । लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं हिना चाहिए की बच्चे अपना ज्यादा समय अपने डिवाइस से चिपक कर ही बिताएं। सूए बताती हैं "आत्मविश्वास, सोशल स्किल्स और किसी भी काम में फोकस रहने की क्षमता उन्हें किसी भी संभावित भविष्य के लिए तैयार रखेगी।"

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