क्या आपका बच्चा विडियो गेम खेलता है ? 8 कारण आपको उसे रोकना चाहिए

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वीडियो गेम पूरी तरह से बच्चों के दिलो दिमाग पर हावी हो गए हैं।

आप अपने बचपन के दिनों को याद कीजिए कैसे दोपहर में जब आपके पैरेंट्स सोना चाहते थे तो आप अपने कजिन के साथ खेलना और शोरगुल मचाना , साइकिल चलाना और हाइड एंड सीक खेलना तो सबसे फेवरिट गेम होता था।  

जब स्कूल शुरू होने वाला होता था तो सभी अपने होमवर्क खत्म करने में जुट जाते थे ताकि अपने दोस्तों कें साथ बाहर खेलने जा सकें। पूरा समय बाहर खेलते रहते थे और कोई भी घर लौटना ही नहीं चाहता था। पैरेंट्स खींच खींच कर वापस लेकर आते थे।  

अब 21वीं सदी में क्या आपके बच्चे बाहर खेलना चाहते हैं? क्या जब वो घर वापस आते हैं तो उन्हें स्कूल का होमवर्क पूरा करने की जिम्मेदारी होती है या वीडियो गेम खेलने की। मुझे पूरा विश्वास है कि ज्यादातर पैरेंट्स कि दूसरे भाग के प्रश्न से सहमत होंगे। इस समय ये बच्चों के सबसे बड़े दुश्मन हैं।वीडियो गेम पूरी तरह से बच्चों के दिलो दिमाग पर हावी हो गए हैं।  

 
जानिए कि वीडियो गेम का आपके बच्चों पर क्या बुरा असर पड़ता है 

 src=https://www.theindusparent.com/wp content/uploads/2017/03/games.jpg क्या आपका बच्चा विडियो गेम खेलता है ? 8 कारण आपको उसे रोकना चाहिए
1. ये बच्चों को मोटा बनाता है - मोटापा कभी भी भारतीय पैरेंट्स के लिए चिंता का विषय नहीं हुआ करते था लेकिन अभी ये घर का सबसे बड़ा टेंशन है। सिर्फ बैठ कर काम करने और नहीं खेलने के कारण बच्चे आलसी हो जाते हैं।“

आजकल बच्चे खेलने के लिए बाहर नहीं जाते बल्कि घर बैठे वीडियो गेम्स खेलना चाहते हैं। उनके लिए कोई शारीरिक काम नहीं होता। इसलिए वो धीरे धीरे आलसी हो जाते हैं। आप अगर जाकर सर्वे करेंगे तो 100 में 98 बच्चे वीडियो गेम खेलना पसंद करते हैं।

2.दोस्तों के साथ कोई बॉन्डिंग नहीं - याद कीजिए वो समय जब हम दोस्तों के यहां जाते थे तब इधर उधर दौड़ कर पूरे घर का नक्शा बदल देते थे, हंसी-मजाक,चिल्लाना खत्म ही नहीं होता था।

आज आपके बच्चे जब दोस्तों के यहां जाते हैं तो शायद ही कुछ अलग नजर आए आपको। या तो सारे बच्चे किसी गैजेट में व्यस्त नजर आएंगे या फिर वीडियो गेम खेलते नजर आएंगे।

आजकल के बच्चों में दोस्तों के बीच कोई बॉन्डिंग ही नहीं रहती। अगर वो बात भी करते हैं तो वीडियो गेम्स के बारे में कि स्कोर क्या है, लेवल कौन सा पहुंचा। वो दिन अब गए जब बच्चों के लिए दोस्ती में कई बहुमुल्य चीजें आती थीं जिनका असल जीवन में कोई महत्व नहीं रहता था।

3. पैरेंट्स के साथ कम बातचीत – पैरेंट्स अधिकतर अपने बच्चों से पूछते हैं कि तुम्हारा दिन कैसा रहा, लेकिन बच्चों को ये सब बातें करना समय की बरबादी लगता है। वो इसकी जगह पोकेमॉन को देना चाहते हैं।ये काफी दुखदायी है कि बच्चे आजकल गेम्स में इतने व्यस्त रहते हैं कि उन्हें नहीं दिखता कि उनकी आखों में कितना प्यार है।

4.खराब भाषा– ये भी काफी चिंता का विषय है कि बच्चे दिनभर वीडियो गेम्स खेलते हैं जिसका नतीजा वो अजीब सी लहजे में बात करते हैं। वो कई शब्द तो बोल नहीं पाते और सही शब्दों का इस्तेमाल भी नहीं कर पाते।

5.रिश्तों में समस्या – पहले जब बच्चे शर्मीले होते थे या लोगों से मिलने जुलने से बचना चाहते थे तो पैरेंट्स खासकर उन्हें बाहर ले जाते थे कि उनका ये डर खत्म हो। शांत से शांत बच्चों के भी दोस्त बन जाते थे जिनके साथ वो कंफर्टेबल रहते थे। ये एक छोटा सा कदम होता था ताकि बच्चा आगे जाकर कॉन्फिडेंट बन सके। अब जो बच्चे शांत होते हैं वो भी वीडियो गेम में उलझे रहते हैं। वो सामाजिक होने की कोई कोशिश नहीं करते। वो अपने काम में व्यस्त रहना पसंद करते हैं जिस वजह से बड़े होने के बाद वो पूरी तरह एकांत में रहना पसंद करते हैं और आगे जाकर रिश्तों को हैंडल नहीं कर पाते।

6. आखों की  बीमारी:  कोई भी इसे नहीं झुठला नहीं सकता कि ग्राफिक मूवमेंट और बढ़ती घटती रोशनी का असर उनकी आखों पर पड़ता है। किसी भी स्कूल में जाइए आपको 10 में से 8 बच्चे चश्मे में नजर आएंगे। ये वीडियो गेम पर अधिक समय देने का नतीजा है।

7. गुस्सा और  चिड़चिड़ापन: जब बच्चे मारधाड़ वाले वीडियो गेम्स खेलते हैं तो धीरे धीरे इसका असर उनके व्यवहार पर भी पड़ता है। इसमें इतने तरह खूबखराबे होते हैं कि एक समय के बाद बच्चों को ये नॉर्मल लगता है। इसमें किसी को मारो तो प्वाइंट्स मिलते हैं और आप आगे के लेवल पर जाते हैं। इसका तो ये मतलब हुआ कि अमानवीय व्यवहार में भी कोई परेशानी हैं। कम से कम बच्चे तो यही समझते हैं कि इससे उन्हें फायदा हो रहा। इन गेम्स को खेलने से बच्चों का व्यवहार भी काफी एग्रेसिव हो जाता है। इतनी छोटी सी उम्र में इन बातों का काफी गहरा असर होता है।

8. वीडियोगेम्स की लत:  मुझे लगता है कि ये सबसे बड़ा समस्या है। बिना इस चीज को समझे बच्चे वीडियो गेम्स की जाल में फंस जाते हैं। इसे आप दूर करने की कोशिश कीजिए बच्चे रोएंगे, इमोशनली आपको ब्लैकमेल करेंगे और नखरे भी करेंगे। ऐसे व्यवहार से बच्चों को बचाने के लिए उन्हें वीडियो गेम्स से दूर ही रखें।

उनका व्यवहार देखकर आपको लगेगा कि दे देना चाहिए लेकिन ये गलत है। आपके बच्चे वीडियो गेम्स वापस लेने के सभी रास्ते अपनाएंगे।ये लत नहीं है तो और क्या है। चाइल्ड एंड यूथ हेल्थ की मानें तो कई गेम्स बच्चों के लिए शराब और ड्रग्स जैसे होते हैं। दोनों में कई एक जैसी बातें पाई जाती है।

कैसे पैरेंट्स मदद कर सकते हैं?

हमने पहले ही वीडियो गेम्स से होने वाले नुकसान पर बातें की अब हमें सोचना चाहिए कि एक पैरेंट्स के तौर पर कैसे अपने बच्चों की मदद कर सकते हैं।

बच्चों को वीडियो गेम से रोकना मुश्किल है खासकर शुरूआत में लेकिन ये नामुमकिन नहीं है। इसलिए हमें खुद के साथ शुरूआत करनी चाहिए।

  1. उदाहरण दें – अगर आप भी वीडियो गेम्स खेलती हैं जो इसे बंद करें। बच्चे अपने माता पिता के उदाहरण को मानते हैं और अगर वो अपने मम्मी पापा को वीडियो गेम खेलते देखेंगे तो जाहिर है कि वो भी खेलेंगे। इसलिए इस आदत को छोड़िए और खुद उदाहरण बनिए।
  2. बच्चों को खेलने के लिए मनाएं – आजकल शहरों में तरह तरह के स्पोर्ट्स कल्ब हैं जहां आप अपने बच्चे को उनके फेवरिट गेम्स के हिसाब से डाल सकते हैं। इससे बच्चे की रुचि भी गेम में ज्यादा बढ़ेगी।
  3. अपने बच्चों को समय दें – अपने बच्चे को ज्यादा से ज्यादा समय दें। आप उनके साथ खेलिए, उनकी फेवरिट स्टोरी बुक पढ़िए, जिस काम को करने में मन लगे वो जरुर कीजिए। इस पूरे टास्क का लक्ष्य सिर्फ ये है कि बच्चों को पता चले कि वीडियो गेम सिर्फ इंटरटेनमेंट का साधन नहीं है।

छोटी छोटी बातों से हम बच्चों का भविष्य खराब होने से बचा सकते हैं। बच्चों को वीडियो गेम रूपी शैतान से कैसे बचाया जाए ये हमारे उपर है और हमें ये करना चाहिए।

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Source: theindusparent