17 महीने के बच्चे का development

इस उम्र में बच्चे की पकड़ बढ़ जाती है, शारीरिक रूप से ताकत बढ़ती है और वो पेंसिल और पेन जैसी छोटी चीज़े बड़ी मज़बूती से पकड़ सकते हैं। उन्हें भावनाओं की समझ आने लगती है और वो दुसरो की फीलिंग्स को भी समझते हैं।

बत्तिओं को जलाना – बुझाना, अपनी ज़िप खोलना - बंद करना ये सब काम शिशु इस उम्र में करने लगते हैं। दरवाज़े को खोलना बंद करना ये सब आपके बच्चे की पसंदीदा चीज़ें बन जाती हैं। ऐसा लगता है मानो उनकी ज़िंदगी का एक नया दरवाज़ा खुल गया हो।

शारीरिक विकास

जहाँ एक ओर बच्चे का शारीरिक विकास बहुत तेज़ी से हो रहा होता है वहीँ दूसरी ओर उनकी मोटर स्किल्स का विकास हो रहा होता है। उनकी नन्ही नन्ही उँगलियाँ अधिक निपुण हो रही होती हैं। चीज़ों को पकड़ने की क्षमता उनमे मज़बूत हो जाती है।

बच्चे अपनी क्रिएटिविटी का आग़ाज़ इस दौरान करते हैं। फिर चाहे वो पेपर पे पेन या पेंसिल से लाइन बना न हो या फिर जिपर को खोल के  बांध करना हो। या फिर दरवाज़े के नॉब खोलना, या फिर दराज़ खोलना हो यहाँ तक की वो अपना डाइपर भी अपने आप खोलना सीख लेते हैं। वो हर शेर्णिनि में अपने आप को आज़माना चाहते हैं। इस लिए उनवे कड़ी नज़र रखना ज़रूरी है।

हो सकता है इस समय तक आपका बेबी पॉटी ट्रेनिंग के लिए तैयार हो जाए, पर ये बात ज़रूरी नहीं की सारे बेबीज़ इस कैटगरी में आयें। ज़्यादातर बच्चे इस उम्र में अपने मम्मी पापा पे ही निर्भर रहते हैं बाथरूम जाने के लिए। बच्चों का एक और मनपसंद खेल है फ्रिज का दरवाज़ा बार बार खोलना और बंद करना। हो सकता है की उनको फ्रिज की ठंडी हवा बहुत पसंद आती हो, इसलिए ये बिलकुल सही समय है की आप अपनी चॉकलेट्स फ्रिज के ऊपर वाले शेल्फ में रखना स्टार्ट कर दे।

कई बार तो ऐसा भी होगा की आपके जूते, वॉलेट, चाबियाँ आदि अपने आप ग़ायब हो जाए अपनी जगह से, पर घबराइये मत ये सब आपके नन्हे बच्चे की शरारत है जिसको अब चीज़े उठा के चलने का शौक हो गया है। बच्चों को चीज़ों को फिर से टिक करना या दूसरी जगह ले जाकर सजाना बहुत पसंद होता है।

उनमें अब चलने फिरने का भी स्टैमिना आ जाता है, ज़रूरी नहीं की वो पूरे संतुलित हो। बच्चों का सोफे पे या कॉफ़ी टेबल पे टकराना बहुत ही साधारण सी बात होती है।ये कहना बिलकुल भी गलत नहीं होगा की बच्चों को इस स्टेज पे नाचना और गाना बेहद पसंद होता है। हाँ वो बात अलग है की उनको सुर और ताल की कोई समझ नहीं होती पर फिर भी वो अपने आप को किसी से पीछे नहीं समझते। उनको आपके द्वारा गाए गए गाने भी बहुत आकर्षित करते हैं।

संज्ञानात्मक विकास

बच्चों में पकड़ मजबूत होना इस बात का भी संकेत है की अब उसे खिलौने भी अलग तरह के चाहिए होंगे .जब आप अपने बच्चों को कुछ बता रहे हों तो ध्यान रखिये की आप उन्हें रंग के बारे में भी ज्ञान दे। कुछ बच्चे अपने पसंदीदा रंग की पहचान कर लेते हैं पर अगर बच्चे इसमें अपनी रुचि न दिखाए तो चिंता मत करिये, रंगो को समझना तो बस एक शुरुवाती पढ़ाव है।

इस स्टेज पे बच्चों का खिलौनों को चबाना बहुत ही साधारण है। दरअसल शिशु अपने सेन्सस को इस्तेमाल करना सिख रहे होते हैं और सूंघने की शक्ति का विकास करना इसी प्रोसेस का एक हिस्सा है। इसलिए आपकी प्राथमिकता खिलौनों को साफ़ रखने की होनी चाहिए।

अब शिशु अपने मेमोरी की प्रदर्शनी बहुत अच्छे से करने लगते हैं। वो आपको आभास दिलाते हैं की उन्हें लोग, चीज़े और जगह याद रहती हैं। और अगर आप कभी अपने घर का फर्नीचर चेंज करे, तो अपने बच्चों के फेस पे वो सरप्राइज लुक को नोटिस करना न भूले।

सामाजिक और भावनात्मक विकास

बच्चा अब ना सिर्फ शारीरिक रूप से बल्कि भावनात्मक रूप से भी विकास करने लगता है। इस दौर में वो बहुत सी भावनाओं से संघर्ष कसरत हुए गुज़रता है, फिर चाहे वो ख़ुशी हो या उदासी, गुस्सा हो या निराशा। आप उनकी सहायता उनको इन भावनाओं से सही तरीके से अवगत करवा के कर सकते हैं। यानी की आईडेन्टिफिकेशन ऑफ़ इमोशन्स का सही ज्ञान देना। इस से बच्चे को दूसरों की भावनाएँ समझने में  भी आसानी होती है। ये सहानुभूति का प्रथम स्तर होता है। इस प्रकार आप न केवल उनका ज्ञान बढ़ाएंगे बल्कि उन्हें महसूस भी करवाएंगे की आप उनकी भावनाएं समझते हैं।

ज़्यादातर बच्चे गुस्से में अपने हाथ - पैर जमीन पर मारते है या फिर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते है। इसमें घबराने जैसी कोई बात नहीं है ये सब उनके द्वारा टेंशन रिलीज करने का ही एक जरिया है। कुछ बच्चे अपने मनपसंद खिलौनों को गले लगा लेते हैं और कुछ अंगूठा चूसने लगते हैं। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं वैसे-वैसे उन्हें अपनी भावनाओं पर नियंत्रण करना आ जाता है।

यदि आपका बच्चे किसी व्यक्ति की ओर खास आकर्षण नहीं दिखा रहा तो टेंशन में मत आइये!! दरअसल बच्चे इस उम्र में अपने आप पे ज़्यादा फोकस्ड रहते हैं।अपने बच्चे को समझना और उसके ख्याल रखने के साथ साथ आपको उनकी सीमाएँ भी तय करनी होगी। इससे आप उन्हें एक सुरक्षित माहौल का एहसास देते हैं।

इस उमर में अगर आप बच्चों को ये बताए की उन्हें क्या करना चाहिए न की ये की वो क्या नहीं कर सकते तो उनका रिस्पांस बेटर होता है। ये इसलिए क्योंकि उनमे चीज़ों को नए तरीके से करने की समझ नहीं होती। यदि आप उनसे कहेंगे की “ बॉल मत फेंको” तो उन्हें ये समझ नहीं आएगा की वो फिर उस बॉल के साथ क्या करे!! और यही बात अगर आप उनसे दूसरे शब्दों में बोले  जैसे की “ प्लीज बॉल को निचे रख दो” तो उन्हें समझ आ जाए ग की उनको बॉल निचे रखनी है। बच्चों को ये महसूस करवाइये की आप उनसे क्या अपेक्षा रखते हैं।

ये आपकी जिम्मेदारी है की आप अपनी अपेक्षाओं में रीयलिस्टिक रहे। बच्चों का दिमाग बहुत सी बात में उलझा होता है, वो बहुत सी चीज़ें सिखने और समझे की कोशिश में होते हैं और इसलिए उनके लिए सारे नियमों को याद रखना एक मुश्किल कार्य है।

ये बात आपके लिए जानना बहुत ज़रूरी है की आप उसके जीवन का केंद्र हो, आपके द्वारा उनके प्रति की गयी कोई भी तारीफ़ उनके मनोबल को और मजबूत कर देती है। हमेशा उनके सही काम में उनको सराहिये और उन्हें गले लगा के उस बात के लिए प्रेज़ कीजिए।

भाषण और भाषा

हमारे शब्द, बच्चों के लिए ध्वनि से ज़्यादा, कुछ भी नहीं होते और उनकी कोशिश इस ध्वनि को निकालने की ही होती है। एक पल वो फुसफुसा रहे होंगे तो दूसरे ही पल चिल्ला रहे होंगे, अगर सुबह के समय बड़बड़ा रहे होंगे तो शाम के समय गुर्रा रहे होंगे ।

भाषण विकास के इस हिस्से में बच्चा अपने मुंह, ज़बान और वोकल कोर्ड्स को अलग-अलग तरीके से चलाना सीखते हैं ताकि अलग-अलग तरह की आवाज़ और शब्द बना सके।

रोज़मर्रा के खेलो में शामिल करके आप बच्चों को स्पीच डेवलपमेंट की ट्रेनिंग दे सकते हैं, फिर चाहे वो मॉन्स्टर बन के एक दूसरे पे गुर्राना हो या फिर ज़ोर ज़ोर से गाना हो। एक बार बच्चा अच्छे से ट्रेन हो जाता फिर वो चिल्लाने की प्रक्रिया कम कर देता है।

इस स्टेज पर आप एक कम्युनिकेशन को अच्छे से इस्टैब्लिश कर सकते हैं। पहले जहाँ आप सिर्फ एक या दो शब्दों में अपने बच्चे से बात करने की कोशिश करते थे वाही अब एक पूरा वाक्य इस्तेमाल कर सकते हैं। जैसे की “ देखो, वह एक सुंदर सा फूल है” या फिर “ प्लीज, बड़े ब्लॉक्स को निचे रख दो”।

माता पिता के लिए टिप्स

अगर आप अपने बच्चे से बात कर रहे हैं और वो आपको सिर्फ देख रहा है, या फिर अपना सिर घुमा कर एक आँख से आपकी ओर देख रहा है या अपने खिलौनों को अपने आँखों के बहुत नजदीक पकड़ रहा है, तो आपको अपने शिशु विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।

सारे बच्चे अपने समय से विकास करते हैं। कुछ अपनी भावनाएँ चुप चाप एक कोने में बैठ के व्यक्त करते हैं तो कुछ चिल्ला के।कुछ बच्चे ड्राइंग करना पसंद करते हैं तो कुछ पेंसिल स्केच बनाना ।

इन एक्टिविटीज का उनके भविष्य और शिक्षा से कोई लेना-देना नहीं है। ये तो बस उनके निजी विकास का एक पहलू है। इतिहास गवाह है, मशहूर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने 3 साल की उम्र में बोलना शुरू किया था।

अपने शिशु के विकास के बारे में और भी जानने के लिए आप हमारे अन्य आर्टिकल भी पढ़ सकते हैं। और यदि आप अपने शिशु को लेकर ज्यादा चिंतित है तो अपने शिशु विशेषज्ञ से जल्द से जल्द संपर्क कर, अपनी दुविधा उन्हें बताए।

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