बच्चों में jealousy : आपको कब चिंता करनी चाहिए ?

 ईर्षा

 

 

ईर्ष्या, ये एक अनकही कहानी है । आपका 11 साल का बच्चा लेटेस्ट आई-पैड चाहता है क्योंकि उसके बाकी टैब अब पुराने हो गये हैं । फैशन की दुनिया इतनी तेजी से आगे बढ़ती है की आपकी बेटी के लिए कभी भी कपड़े आदि पूरे नहीं पड़ते ।

पहले पेंसिल बॉक्स, बार्बी डॉल, क्रिकेट के बल्ले कल को कुछ और । इच्छाएं कभी खत्म नहीं होती ।इन सबके पीछे एक ही कारण है वो है ईर्ष्या ।

बच्चों में ईर्ष्या एक साधारण बात है । ये मार्केट में नए सामान को देखकर या नए बैग को देखकर या नए जूते आदि को देखकर हो सकता है । लड़किओं में ये ज्यादातर कपड़ों को लेकर होता है । BARC में काम करने वाली उर्षा चवन के लिए अपने 6 साल के बच्चे को आराम से समझाना ही काफी होता है । एक बार उन्होंने अपने बच्चे को धारावी के बच्चों से मिलवाया और सिखाया की कैसे बिना ज्यादा सामान के भी वो खुश रहते हैं । उसके बाद से उसने डिमांड करना कम कर दिया और बातों को समझने लगी ।

बच्चों में ईर्षा के संकेत

ईर्ष्या अक्सर घर पर शुरू होता है। घर में एक प्रतिस्पर्धा का माहौल बच्चे में प्रतिस्पर्धा की भावना को फैलाती है अगर आप बच्चे के साथ खेलने से ज्यादा जीत और हार पर ध्यान देते हैं ।

सादिया रावल , इनर स्पेस , परामर्श केंद्र में संस्थापक और मुख्य मनोविज्ञानी के मुताबिक “ इस बात का ध्यान देना जरुरी है की ऐसी चीजों के लिए इंतज़ार करना जो बाकी सभी दोस्तों के पास हो बच्चों के ऊपर बहुत ज्यादा असर डालती है ।” जब बच्चा कोई ऐसी चीज़ देखता है जो उसके पास नहीं है तो उसे बेचैनी हो जाती है । उसके अन्दर की भावनाएं उससे सवाल पूछने लगती हैं । ऐसे में जरुरी है की आप कुछ ऐसा करें जिससे बच्चे को बेहतर महसूस हो ।

ईर्षा  होने के कुछ संकेत इस प्रकार हैं :

  • काटना : कुछ अध्ययनों के मुताबिक बच्चे ईर्ष्या में लड़ाई झगड़े के साथ ही चोट भी पहुंचा सकते हैं ।

  • ध्यान अपनी ओर खींचना: अगर आपका बच्चा आपका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना चाहता है तो टाइम आ गया है की आप इसपर ध्यान दें ।

  • बर्ताव में अचानक बदलाव आना : कुछ बच्चे अजीब बर्ताव करते हैं । कुछ गुस्सैल हो जाते हैं, तो वहीँ कुछ किसी सामान के प्रति बहुत ज्यादा प्यार कर सकते हैं ।

 

 

 

बच्चों में ईर्षा  की भावना को कैसे नियंत्रित करें ? जानने के लिए पढ़ते रहें ।

 

 

ईर्षा

बच्चों में ईर्षा  की भावना को कैसे नियंत्रित करें ?

रावल बताते हैं की ऐसे मामलों में बच्चों से बात करना ही एक उपाय है । अगर बच्चा बात ना करें तो भी उससे बात करने की कोशिश करें , उससे उसके मन में चल रही बातों के बारे में पूछें । हो सकता है की किसी चीज के बारे में बताने की जगह वो उस चीज़ के बिना कैसा महसूस करता है , यही बता दे ।

विशेषज्ञों के मुताबिक अगर आप अपने बच्चे से बात करने जा रहे हैं तो निम्नलिखित बिन्दुओं पर ध्यान देना चाहिए :

  • अपने बच्चे के आत्म अवधारणा और आत्मसम्मान का ध्यान रखें 

  • ज्यादा प्रतिस्पर्धी होने के लिए अपने बच्चे पर दबाव न डालें 

  • जीत और हार के लिए एक स्वस्थ दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करें 

  • किसी और से, यहां तक ​​कि भाई तक से उसकी तुलना न करें । वे अपने स्वयं के रोल मॉडल चुन सकते हैं और इसकी तुलना केवल मामले को बदतर कर देगा 

  • आदतें जल्दी शुरू हो जाती हैं लेकिन उनसे पीछा छुड़ाना आसान नहीं है इसीलिए समय दें 

  • ईर्षा कभी अकेले समस्या लेकर नहीं आती । हो सकता है की ईर्ष्या जताने की शुरुवात गुस्से और झगड़े से भी हो

 

रावल बताते हैं की बच्चे को उसकी जीत और हार से ज्यादा काम को अच्छे से करना सिखाएं । उसके गुणों पर ध्यान दें । हमेशा उसकी कमजोरी के बारे में बात करके आप कोई मदद नहीं कर रहे । बच्चों में ऐसी भावना माता पिता से ही आती है । “ अगर हम किसी चीज को पाने के पीछे पड़े रहेंगे तो हमारे बच्चे भी यही सीखेंगे” इसीलिए हमें खुद पर भी नियंत्रण रखना चाहिए ।

 

क्या स्कूल बच्चों में ईर्षा की भावना पैदा करने का श्रोत बन गये हैं ?

घर पर लाख कोशिशों के बावजूद बाहरी चीजें बच्चों में ईर्ष्या की भावना को जन्म दे सकती हैं । इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा स्कूल से आता है जहाँ अलग-अलग वर्ग के बच्चे एक साथ बैठते, पढ़ते और खेलते हैं । ये एक ऐसी भी जगह हैं जहाँ दूसरों से तुलना करने का दौर शुरू होता है ।

पहले स्कूल नियम तय करके इससे बच्चों को बचाया करते थे । नियम तय किये जाते थे जिससे अलग-अलग पृष्ठभूमि के बच्चे स्कूल में एक जैसे दिखें और उनमें कोई ईर्षा  की भावना न उत्पन्न हो । 3 साल के बच्चे की माँ रीना माथुर अपने स्कूल के दिनों को याद करते हुए बताती हैं की स्कूल में महंगे सामान लाने की इजाज़त नहीं होती थी ।

वो बताती हैं की “ हमें महंगी घड़ियों आदि को पहनने से भी मना किया जाता था, फैंसी पेंसिल बॉक्स लाने की भी मनाही होती थी । पहले हमें ये सब बहुत अजीब लगता था पर आज के बच्चों की डिमांड देखकर वो सब आज सही लगने लगा है ।”

रावल बताते हैं की बच्चों को कैसे हैंडल किया जाए जब उनकी ईर्ष्या उनके अहं से जुड़ जाए । “ अगर बच्चा सिर्फ इसीलिए स्कूल न जाना चाहे क्योंकि उसके दोस्तों के पास वो चीजें है जो उसके पास नहीं है , तो ये बिलकुल बच्चे के अहं की बात है “ कई बार बच्चों के पास कुछ चीजें होने से मामला संभल जाता है लेकिन न होने से ये बिगड़ता ही चला जाता है । माता पिता को बच्चों की भावनाओं से जुड़े रहना चाहिए जिससे बच्चों में ईर्ष्या की भावना का पता लगाया जा सके साथ ही उनके आत्म सम्मान को बढ़ावा दिया जा सके ।

चावला बताते हैं की " जितना आप देंगे , उतना ही बढ़ावा मिलेगा और हालात को संभालना उतना ही मुश्किल होता जाएगा"

 

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