होलिका दहन की परंपरा और पूजन की विधि जानिए

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इस वर्ष होलिका दहन के मुहुर्त में पूर्णिमा के साथ भद्रा काल भी पड़ रहा है । आपको बता दें भद्रा काल में होलिका जलाना वर्जित रहता है

होली रंग और उमंग का उत्सव है । फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन की परंपरा है । हर युग में होली को आनंद के उत्सव के रुप में स्वीकार कर नई कहानियां गढ़ी गई । चाहे त्रेता युग में श्री राम चंद्र की सीता और अवध वाली होली हो या द्वापर युग में गोपियों संग श्री कृष्ण की रंगों भरी रासलीला । होलिका जलाने की विधि मुख्य होली से एक दिन पूर्व होती है ।

ऐसी धारणा है कि होलिका की हार और प्रह्लाद को जीवन दान मिलने से ही होली के पर्व की शुरुआत , बुराई पर अच्छाई की जीत के रुप में की गई ।

होलिका दहन की कथा

होलिका दहन की परंपरा और पूजन की विधि जानिए

आपको बता दें कि होली शब्द होला से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ होता है नई एवं अच्छी फसल के लिए भगवान की पूजा । फाल्गुन मास में होली के समय खेत में उपजा हुआ नया अन्न घर आता है जिससे हवन एवं भगवान की पूजा-अर्चना करने की पुरानी परंपरा रही है । होलिका दहन में भी सामग्रियों एवं प्रसाद के तौर पर नवान्न का भोग लगाया जाता है ।

विष्णु पुराण में वर्णित कथा के अनुसार होलिका नाम की राक्षसी को आग में भस्म ना होने का आशिर्वाद मिला था । जिसका भाई हिरण्यकश्यप खुद को भगवान मानता तथा विष्णु से द्वेश रखता था लेकिन विडंबना ऐसी थी कि उसी हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रहलाद् श्री विष्णु के अनन्य भक्त थे ।

प्रह्लाद को पिता की दुश्मनी मंजूर थी लेकिन अपने प्रिय भगवान विष्णु से विमुख होना कतई पसंद नहीं था । उनकी भक्ति से रुष्ट होकर पिता हिरण्यकश्यप ने बहन होलिका के साथ मिलकर प्रहलाद को भस्म करने की योजना बनाई । जलती चिता में प्रवेश कर होलिका ने प्रहलाद को अपनी गोद में बिठा लिया । लेकिन आग की लपटें भगवान के भक्त प्रह्लाद का बाल भी बांका ना कर सकी पर होलिका अग्नि देव की चपेट में आ गई ।

कैसे करें होलिका दहन

होलिका की रात्रि को सिद्ध रात्रि माना जाता है जिसमें देवी-देवताओं को प्रसन्न किया जा सकता है । इस वर्ष होलिका के मुहुर्त में पूर्णिमा के साथ भद्रा काल भी पड़ रहा है । आपको बता दें भद्रा काल में होलिका जलाना वर्जित रहता है इसलिए इस वर्ष भद्रा काल के समाप्त होने के बाद 7 बजकर 51 मिनट से होलिका दहन करना शुभ माना जाएगा ।

  • होलिका जलाने वाले स्थान को गंगाजल से शुद्ध कर के एरंड या गुलर की टहनी को जमीन में गाड़ दी जाती है फिर उस पर गोबर के उपले डाल कर आग लगाई जाती है ।
  • होलिका पूजन के लिए सामग्रियां जुटा लें जैसे एक कलश में जल, चावल, धूप, दीप, फूल, कच्चा सूत , गुड़ , हल्दी, बताशे एवं नारियल से होलिका को पूजना चाहिए ।
  • पूजन के बाद होलिका की परिक्रमा लगाते हुए उसमें कच्चा धागा 7 बार लपेटें ।
  • भक्त प्रह्लाद एवं भगवान नरसिंह का स्मरण कर उन्हें पूजन सामग्री अर्पित करें ।
  • होलिका दहन में गोबर के उपले, नई फसल जैसे गेहूं की बालियां या 7 तरह के अनाज जैसे मूंग, उड़द, गेहूं, चना, चावल, मसूर वं जौ चढ़ाने का भी बड़ा महत्व है ।
  • होलिका की आग में अन्न के दानों को सेंक कर प्रसाद स्वरुप घर लाया जाता है जिसे ग्रहण करने के दौरान समृद्धि की कामना की जाती है । होलिका दहन के बाद बड़ो को गुलाल लगा कर आशिर्वाद लिया जाता है ।  

Written by

Shradha Suman