सीज़ेरियन डिलीवरी के दौरान हुआ कुछ ऐसा जिसे मैं कभी भूल नहीं सकती...

प्रेगनेंसी अपने साथ स्वास्थ्य संबंधित कई तरह की दिक्कतें लेकर आती हैं जिनका सामना हर मां को करना ही पड़ता है लेकिन कुछ महिलाओं के लिए ये कुछ अधिक ही कष्टदायी हो जाता है ।

गर्भावस्था का पूरा समय प्यार और कठिनाईयों भरा रहता है । एक प्यार वो जो आप अपने शिशु के लिए महसूस करती हैं और दूसरा जो आपको परिवार के सदस्यों से मिलता रहता है । चूंकि इस दौरान कई तरह के शारीरिक और मानसिक बदलाव का सामना भी आपको लगातार करना होता है इसलिए ये अवस्था महिलाओं के लिए मुश्किलों भरा हो सकता है ।

इस लेख के माध्यम से मैं अपना अनुभव आप से साझा करना चाहुंगी जिसके कारण मेरे लिए सीजेरीयन डिलीवरी कभी ना भूलाने वाला एक डरावना और कष्टदायी अनुभव बन गया ।

मैंने नार्मल डिलीवरी के लिए कड़ी मशक्कत की थी

प्रसव पीड़ा का कोई अनुभव तो मुझे हो नहीं सका क्योंकि ड्यु डेट के 4 दिनों बाद ही मैं सीजेरियन के लिए तैयार हो गई थी । मैंने नार्मल डिलीवरी के लिए कड़ी मशक्कत की थी कई तरह के व्यायाम और योगा भी किया । कारण ये था कि मैं जल्द से जल्द रिकवर करना चाहती थी और अपने शरीर पर कट मार्क होने को लेकर भी मैं काफी चिंतित थी ।

मुझे किसी ने ये भी सलाह दी कि होमियोपैथी में नामर्ल डिलीवरी के लिए मां के शरीर को तैयार करने की अचूक दवा उपलब्ध है उसकी भी पूरी खुराक मुझे दिलवाई गई लेकिन अंत में सारे प्रयास विफल ही रहे । क्योंकि ये जरुरी नहीं की हर किसी को एक ही दवा सूट कर जाए ।

आखिरी महीने के चेकअप के दौरान मेरा आंतरिक परीक्षण करने के बाद डॉक्टर ने बताया कि बच्चे का पूरा विकास हो चुका है और वजन भी 4 किलो के आस-पास है इसलिए प्राकृतिक रुप से बच्चे को जन्म देना खतरनाक भी हो सकता है । इसलिए डॉक्टर की सलाह मानकर मैं इलेक्टिव सिजेरियन की बात से सहमत हो गई ।

प्रेगनेंसी अपने साथ स्वास्थ्य संबंधित कई तरह की दिक्कतें लेकर आती हैं जिनका सामना हर मां को करना ही पड़ता है लेकिन कुछ महिलाओं के लिए ये कुछ अधिक ही कष्टदायी हो जाता है ।

मैं 8 महीने की प्रेगनेंट थी जब मुझे जुख़ाम हुआ था

मैं 8 महीने की प्रेगनेंट थी जब मुझे जुख़ाम हुआ था । बचाव के लिए मैंनें कई तरह के घरेलू नुस्खे आज़माये यहां तक की ऐंटीबॉयोटिक्स भी डॉक्टर की सलाह से लेती रही पर कोई फायदा नहीं दिखा धीरे-धीरे मेरे पीठ के ऊपरी हिस्से में बांयी ओर असहाय पीड़ा महसूस होने लगी । दरअसल शिशु की वजन के साथ खांसते हुए नस में खिंचाव आ गया था ।

मुझ पर कोई भी दवा असर नहीं कर रही थी खैर, महीने भर में कुछ आराम जरुर मिल गया था । समय पूरा हो जाने के बाद जब मेरी गायनो ने मुझे अगले दिन ही इलेक्टिव सिजेरियन को कहा तो मैंने उन्हें मंजूरी दे दी । मुझे याद है सुबह 8:30 का वक्त था और मैं ऑपरेशन थिएटर पहुंच चुकी थी । दिल की बढ़ी हुई धड़कनें थमने का नाम ही नहीं ले रही थी लेकिन वहां मौजूद नर्स, डॉक्टर के लिए तो ये रोज का काम था ।

बड़ी-बड़ी लाईट्स, एक कोने में रखे दस्ताने, कई तरह की सूईयों के पैकेट्स और दवाईयों की अजीब सी सुगंध मुझे बेचैन कर रही थी । मन ही मन मैं ऑल इज़ वेल...ऑल इज़ वेल कह रही थी । लेकिन फिर भी डर लग रहा था । तभी हेड नर्स ने मुझसे कहा कि आओ यहां लेट जाओ ज्यादा वक्त नहीं है अब...

यहां मैं एक बहुत ही अहम बात बताने जा रही हूं...खास कर उनके लिए जो पेशे से डॉक्टर या नर्स हैं...ऑपेरेशन थीयेटर में जब नर्स आपस में हंसी-मज़ाक करती हैं या ऊल-जलूल की बातें करती हैं तो इसका मरीज़ पर बुरा असर पड़ता है ।

माना कि अस्पताल में काम करते हुए आपने कई मरीज़ देखे हैं और आपके लिए ये सब बेहद ही सामान्य है पर कृपया ये भी याद रखें कि कोई बार-बार सर्जरी  कराने नहीं आता...हर पेशेंट को हिम्मत दिलाने की जरुरत होती है ।

संभव है कि बातों में मशगूल होकर आप उन्हें असुरक्षित महसूस करा रही हों ।यह मेरा अपना अनुभव है क्योंकि जिस वक्त मेरी आंखों पर पट्टी थी और ऑपरेशन के लिए सारी तैयारियां की जा रही थी उसी वक्त वहां मौजूद एक नर्स की शादी की सालगिरह मनाने की योजना बनाईं जा रही थी, बात बढ़कर उसकी सुहागरात तक पहुंच चुकी थी । खैर, सब सुनने के बाद मेरी घबराहट इस बात से थी कि कहीं ये लोग जल्दीबाज़ी में कोई गड़बड़ ना कर दे ।

मेरी सर्जरी शुरु होने के साथ ही मुझे अचानक खांसी आने लगी छाती से लेकर पूरे गले तक कफ के फंसने जैसा फील हुआ खूब जोर से खांसने का मन हो रहा था ताकि ठीक से सांस ले सकूं । हाथ की नस के द्वारा मेरे शरीर में पानी चढ़ाया जा रहा था जिसे तत्काल ही रोक दिया गया।

मुझे जख्म के कारण बैठा नहीं जा रहा था

क्योंकि उसी की वजह से मुझे अचानक से कोल्ड हो गया। मेरे पेट के सबसे नीचले हिस्से को तब तक दो भागों में बांटा जा चुका था इसलिए मैं खांसी नहीं कर पा रही थी और ना अधिक हिल सकती थी । धीरे-धीरे मेरी हालात बेहोशी जैसी होती गई मेरा शिशु जन्म ले चुका था ।

आगे का 6 दिन मेरे लिए मुश्किलों का सबब बन गया था । कमजोर पड़े शरीर में पानी की जरुरत को पूरा करना संभव नहीं हो सका । डॉक्टर को डर था कि अधिक खांसी से मेरे स्टिचेज़ खुल सकते हैं । मुझे जख्म के कारण बैठा नहीं जा रहा था और लेटते ही खांसी जान लेने पर आमदा हो रही थी ।

खांसने से पेट के नीचले हिस्से पर दबाब बनता है जिसके कारण मुझे ऑपरेशन की जगह असहाय दर्द होने लगता था । उस वक्त मुझे लगता था कि काश मुझे नार्मल प्रसव हो पाता इस जख्म की पीड़ा सहन नहीं हो रही थी । दर्द मिटाने के लिए बार-बार सूई लगानी पड़ती थी और ऐंटीबॉयोटिक्स के लिए भी कई इंजेक्शन लगाते जाते थे जिसका अनुभव और भी डरावना था ।

अधिकांश परिस्थिति में सिजेरियन मां और शिशु दोनों के लिए आरामदायक होता है । लेकिन मेरे साथ खांसी वाली समस्या के बढ़ने से तमाम परेशानियां हुईं । इसलिए आप से यही कहुंगी कि गर्भावस्था के आखिरी दो महीने पूरी सावधानी से रहें ।

बीमार या सर्दी होने के सभी कारणों से दूर रहें और यदि संभव हो तो तब तक सिजेरियन ना कराएं जब तक खांसी की समस्या से निज़ात ना मिल गया हो ।