"सास-ससुर सभी गलत नहीं होते.... कभी-कभी आपकी सोच गलत होती है"

बात उन दिनों की है जब मेरी नयी नयी शादी हुई थी। एक साल होने को ही था तो एक दिन पापा से पता चला की पिछले एक हफ्ते से मम्मी के घुटने बहुत दर्द करे रहे हैं।

बात उन दिनों की है जब मेरी नयी नयी शादी हुई थी। एक साल होने को ही था तो एक दिन पापा से पता चला की पिछले एक हफ्ते से मम्मी के घुटने बहुत दर्द करे रहे हैं। पीड़ा इतनी तीव्र है की उनको चलने फिरने तक में तकलीफ हो रही थी। फ़ोन पे बात करते करते ही गला भर आया और मैं बोली मैं ऑफिस से छुट्टी लेकर आती हूँ देखने मम्मी को। मन तो हुआ की कैसे जल्दी से जल्दी अपनी माँ के पास जाऊं।

पापा ने कहा,"रहने दे, बेटा। बुढ़ापे में तोह यह सब लगा ही रहता है।" मैंने डाँटते हुए कहा अरे कैसे ना आऊँ... मम्मी ने तो कभी १०४ बुखार में भी बिस्तर नहीं पकड़ा। ज़रूर ही कोई बड़ी बात है। मैं कल की ट्रैन से आती हूँ। ऐसा कहते ही मैंने फ़ोन काट दिया। आप ही बताइये कौनसी ऐसी बेटी होगी जो दुःख तकलीफ में अपने माँ बाप को देखने ना जाए। और छह घंटे ही तो दूर है देहरादून दिल्ली से। दिन में ही पहुँच जाऊंगी।

मैंने तत्काल में टिकेट निकलवाई और सुबह-सुबह की ट्रैन से रवाना हो गयी। ट्रैन में बैठे ही थी तो सास का फ़ोन आ गया। उनका मायका दिल्ली में था और उनकी माताजी की तबीयत बहुत खराब थी जिसकी वजह से वह उनके साथ रह रही थी देख रेख के लिए। मैंने प्रणाम करते ही बोला मम्मी मैं सकुशल ट्रैन में बैठ गयी हूँ ( जी हाँ छोटे शहर के पेरेंट्स अपने जवान बच्चों की आने-जाने की चिंता उनके बुढ़ापे तक करते हैं। )

"ठीक है, एक नज़र पापा को भी देख आईओ, "कहते हुए उन्होंने फ़ोन रख दिया. मुझे बड़ा गुस्सा आयी। मायका और ससुराल एक ही शहर में होना ही नहीं चाहिए। खैर अब बात रखने के लिए तो जाना ही पड़ेगा।

हमारे पहाड़ों में एक और रीत है की नयी बहु अगर अपने ससुराल से दूर कहीं रहती है तो पहले ससुराल जाती है क्यूंकी वह ही उसका घर होता है। मैंने सोचा चलो खड़े-खड़े निपटा दूंगी। अकेले हैं ससुरजी क्या बात करेंगे । कुशल मंगल पूछते ही छू मंतर हो जाऊंगी।

आज खाना बनाने वाली भी नहीं आयी...

ट्रैन अपने सही समय पर दोपहर के लगभग एक बजे देहरादून पहुँच गयी। मैंने तुरंत रिक्शा किया और ससुराल की और चल पढी। ससुर जी के साथ पाँच दस मिनट बात करने के बाद बोली पापा मैं चलती हूँ। वैसे तोह कल ही वापसी है पर समय मिलेगा तोह मिलते हुए जाएंगी।

वो बोले,"अरे ऐसे कैसे खाना तो खा लेते हैं। तेरे चक्कर में मैंने खाना भी नहीं खाया। तेरा इंतज़ार कर रहा था। आज खाना बनाने वाली भी नहीं आयी है।" इतना कह कर वह किचन की तरफ कूच कर गए।

मुझे मन ही मन बड़ा गुस्सा आ रहा था... अच्छा एक दिन के लिए बहु अपनी बीमार माँ को देखने आयी है लेकिन ये चाहते हैं की मैं पहले इनके लिए पकवान बनाऊं। इनको ज़रा भी नहीं लगा की मैं अपनी माँ के चलते कितनी परेशान हूँ। यहां इन्हें खाने की पढी है।

गुस्से में उठ कर किचन की ओर बढ़ने ही जा रही थी की डाइनिंग रूम से आवाज़ आयी "कहाँ रह गयी?" मैं डाइनिंग रूम पहुंची तो देखा की खाने की मेज़ पर तो खाना लगा हुआ था। चौंकते हुए मैंने कहा लेकिन आप तो कह रहे थे की कामवाली नहीं आयी, पापा।

"मैंने बनाया है," वो तपाक से बोले। "दाल चावल मुझसे जल जाता है इसलिए तेरे लिए गोभी की सब्जी और परांठे बनाये है। दही मैं बाज़ार से ले आया"

मैंने संकुचाते हुए बोला अरे आपने तकलीफ क्यों की। "क्यों मैं अपने लिए भी तो कुछ बनाता ना। अब जल्दी से खा लेते हैं और फिर में तुझे तेरी मम्मी के यहां पहुंचा देता हूँ। सुबह से तेरी हालात पतली हो रखी होगी।"

मम्मी मेरी राह देख रही थी...

मम्मी के यहां पहुंची तो वो वहॉं मेरी राह देख रही थी। "कितनी देर लगा दी मैं इंतज़ार में बैठी हूँ की कब तू आएगी और कब हम खाना खाएंगे। "

उस एक पल मेरी आखों में आंसू आ गये। इतनी बीमारी में भी मम्मी को मेरे खाने की पढी है। मम्मी ने सोचा मैं उनकी तकलीफ की वजह से रो रही हूँ।

"अरे एक दो महीने में ठीक हो जाना है मैंने। तू चिंता मत कर। चल खाना खा लेते हैं।"

मम्मी के साथ भीतर जा ही रही थी की अचानक ध्यान आया एक घंटे पहले मेरे ससुर जी ने भी तो यही कहा था की मेरे इंतज़ार में उन्होंने खाना नहीं खाया। पर मैंने क्या क्या सोच लिया उनके बारे में और मैं कितनी गलत साबित हुई। अगर यहां एक माँ अपनी बेटी के साथ खाना खाने का इंतज़ार कर रही थी तो वहा भी तो एक पिता अपनी बेटी जैसी बहु के साथ खाना खाने का इंतज़ार कर रहा था। तो फिर किसकी सोच गलत थी। आप ही बताइए?

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