मैं 20 साल की उम्र में मां बनी... और मुझे इस बात का कोई अफसोस नहीं

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उम्र लड़कियां कॉलेज इंज्वॉय करती हैं, पार्टी करती हैं और बिंदास लाइफ इंज्वॉय करती हैं मैंनें मां बनने का रास्ता चुना ।तब मैं महज 20 साल की थी।

आप मुझे हमेशा मना क्यों करती हैं? मैं देर रात तक क्यों नहीं रूक सकता? मैं वीडियो गेम क्यों नहीं खेल सकता ? इस तरह के कई प्रश्न हैं जिनसे मैं दिन-रात दो चार होती हूं।

मातृत्व की दुनिया में आपका स्वागत है!

जिस उम्र लड़कियां कॉलेज इंज्वॉय करती हैं, पार्टी करती हैं और बिंदास लाइफ इंज्वॉय करती हैं। मैंनें मां बनने का रास्ता चुना तब मैं महज 20 साल की थी। 21 साल में मेरा बेबी का जन्म हो जाए।

जब आप पहली बार आप अपने बेबी को देखते हैं

मेरे हथेलियों में उसकी छोटी छोटी उंगलियां, उसकी बिल्कुल मुलयाम निकलती त्वचा इन सब को देखकर मुझे अपने बेबी से प्यार हो गया। सबसे पहली बात अपने बेबी को देखकर जब दिमाग में आती है वो ये कि कैसे मैंने इस बेबी को बनाया और जन्म दिया, एक जीता जागता इंसान मेरा ही अंश। एक बार जब आप इन सब से आगे बढ़ जाते हो तो अपने एक एक पल को इंज्वॉय करने लगते हो और खुद को आगे आने वाली परिस्थितियों के लिए भी तैयार कर लेते हो।  

src=http://www.theindusparent.com/wp content/uploads/2017/01/shivangi 1.jpg मैं 20 साल की उम्र में मां बनी... और मुझे इस बात का कोई अफसोस नहीं

मेरा बेटा काफी खुशमिजाज, खेलने वाला आसानी से लोगों से घुलने मिलने वाला था। एक ज्वांइट भारतीय फैमिली में उसे हर किसी का बहुत ही ज्यादा प्यार मिला।नानी की तरफ पीढी का पहला बेबी होने के कारण उसे सबसे ज्यादा प्यार मिला। वो सबका चहेता था।

वो तभी रोता था दब उसे भूख लगती थी और शुक्र है कि कभी रोने को लेकर चिंता नहीं हुई। हालांकि वो सोता नहीं था ये भी काफी बड़ी समस्या थी। वो चिड़चिड़ा व्यवहार नहीं करता था लेकिन उसका कभी भी चाहे दिन हो रात सोने का मूड ही नहीं होता था।

दिन तो भी निकल जाता था क्योंकि वो खेलते रहता था।शुरूआत में अपने हाथ पैर हवा में फेंकता था फिर बिठा कर खिलौने दे देने पर उसी में व्यस्त रहता था। जब एक साल का हुआ तो पूरे घर में इधर से उधर घूमता रहता था। गर्मियों के दिनों में दोपहर में हमेशा उसके पीछे पीछे रहना पड़ता था।

सोने के दौरान भी वो अचानक अपनी आखें खोलकर मुझे देखता और एक प्यारी सी मुस्कान के बाद वापस सो जाता। अगर वो उठते ही मुझे बिस्तर के आस पास नहीं देखता था जो जोरों से रोता था।

रात में थोड़ी मुश्किलें तो आती थीं। 6 महीनों तक मेरे पति समुद्र में रहते थे और मुझे तब अपने काम के साथ अकेले बच जाती थी। नींद तो मानों कभी पूरी ही नहीं हो पाती थी। मेरा बेटा लगभग पूरी रात जागता था और दिन में भी वो 30-45 मिनट से ज्यादा नहीं सोता था फिर दो घंटे जागता था। इस तरह से मैं भी आधे आधे घंटे आराम कर पाती थी।

मेरा बेटा काफी मुश्किलों से सोता था

मेरे ससुर की मुझे सुबह के समय सबसे ज्यादा मदद मिलती थी, मैं सुबह बेबी को अच्छे से तैयार कर उन्हें दे देती थी और लगभग चार घंटे की प्यारी सी नींद लेती थी। बेबी तो पूरे दिन में 4-6 घंटे ही सोता था।

भगवान ही जानें कि वो कैसे इतनी एनर्जी और हेल्दी विकास कर पाया जब कि बच्चों को जितनी नींद चाहिए होती है वो उसका आधा भी नहीं सोता था। चुंकी वो काफी लंबे समय तक जागा रहता था इसलिए उसे भूख भी जल्दी लगती थी।हर घंटे ब्रेस्टफीडिंग के अलावा मुझे हर चार घंटे पर बेस्ट फीड उसे देना होता था।इस तरह से चक्र चलता रहा।

जब बच्चे घुटनो के बल रेंगने (Crawling) का समय आया यानी की लगभग 7.5 महीनों  उसे काफी समस्या हुई, हाथों दो खाली फाइलें लेकर वो पांच कदम चला।

अगर बच्चा क्रॉलिंग की जगह चलना ही शुरू कर दे तो समस्याएं होती ही हैं। वो हमेशा कुछ ना करने की फिराक में रहता था। वो हमेशा खड़े हो जाता था, घुटनों के बल चलने की कोशिश करता था और जो भी उसका टारगेट होता था वहां पहुंच जाता था।

src=http://www.theindusparent.com/wp content/uploads/2017/01/ansh.jpg मैं 20 साल की उम्र में मां बनी... और मुझे इस बात का कोई अफसोस नहीं

एक बार वो अपने बनाए जगह के पास पहुंचता था और एक्साइटमेंट में गिर जाता था। इसलिए मुझे हमेशा उसके पीछे खड़े रहना पड़ता था कि इसके पहले कि वो गिरे मुझे उसे पकड़ लेना है। दो महीनों तक ये सिलसिला चलता रहा और वो धीरे धीरे चलना सीखता रहा।

एक बार उसने चलने की शुरूआत की तो अलग ही समस्या मेरे सामने आ हई। जब भी वो रात में टॉयलेट करना चाहता था। वो बिना किसी तरह की आवाज किए बिस्तर पर चलने लग जाता था, मुझे कुछ पता भी नहीं तल पाता। इसलिए मैं सोते भी रहती थी तो अलर्ट रहती थी कि कहीं वो बेड पर से बंद आखों में गिर ना जाए।

दो साल तक उसका कम सोने का सिलसिला चलता रहा और फिर चमत्कार हुआ और वो नॉर्मल बच्चों को जितना सोना चाहिए सोने लगा।

उस समय को देखकर एहसास होता है कि मैंने मां बनने का फैसला कम उम्र में लिया लेकिन मैंने जैसे उस चीजों को संभाला शायद बाद में नहीं संभाल पाती। लगभग हमेशा जागे रहना, नींद में भी एक्टिव रहना और हमेशा उसके पीछे खड़े रहना ताकि वो गिरे नहीं। ये सब मैं तीस साल की होती तो शायद संभव नहीं था।

अब थकावट जल्दी होती है और घुटने भी लगभग जवाब देते हैं खासकर जब मैं स्कॉयट करने की कोशिश करती हूं। मेरी उम्र अधिक नहीं है कि लेकिन सबके पास इतना काम है सब कम उम्र अधिक उम्रदराज महसूस करने लगते हैं।

अब मैं 34 साल की हूं और मेरा बेटा अपने टीनएज में। अब उससे अलग अलग तरीको से पेश आना पड़ता है निपटना पड़ता है। मैंने इस आर्टिकल को लिखने की शुरूआत भी उसके हल्ला-हंगामा  से की जो पूरे दिन का बहुत ही छोटा सा उदाहरण है। ऐसा नहीं है कि आज्ञाकारी नहीं है लेकिन टीनएज का असर उसपर जरूर आ रहा है।

src=http://www.theindusparent.com/wp content/uploads/2017/01/ashish and shivangi.jpg मैं 20 साल की उम्र में मां बनी... और मुझे इस बात का कोई अफसोस नहीं

मैं सिर्फ अपने किस्मत को ही धन्यवाद दे सकती हूं जो कम उम्र में पहले अनुभव लिया और जो आगे करने वाली हूं। मुझे आशंका होती है कि 40 साल के बाद ये सब मैं कर पाती की नहीं।

मैं इस नोट को अपने पति को धन्यवाद किए बिना खत्म नहीं कर सकती जिन्होंने इस बात का ख्याल रखा कि मैं मातृत्व में फंस के ना जाऊं बल्कि लाइफ इंज्वॉय करूं। हम डिस्क जाते थे (ज्वाइंट फैमिली में रहने के फायदे) हमने कई आउटिंग की और अपने बेटे को हर जगह ले गए। इस तरह से मैंने अभी तक अपनी जिंदगी को पूरी तरह से जिया है।

लेखक के विचार : यहां लिखे सभी मेरे विचार मेरे निजी अनुभव हां। मेरा इरादा किसी की भावनाओं को दुखी करना नहीं है। मेरी तरह कई महिलाएं जो अधिक उम्र में मातृत्व को चुनती हैं और मुझसे कहीं बेहतर अपने इस जॉब में हैं। मेरी तरफ से उन सभी माओं का बहुत सारा प्यार।

(About the author: Hailing from the hills, Shivangi Kaushik Dikshit is married to a man from the high seas. Her world revolves around her adorable son.)

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Source: theindusparent