“मैं ससुराल वालों के साथ संयुक्त परिवार में रहती हूं..लेकिन अब इससे निकलना चाहती हूं”

मैं पिछले चार सालों से संयुक्त परिवार में रह रही हूं और चीजें बद से बदतर होती जा रही है।

मैं एक बिजनसमैन फैमिली से हूं और हमारी परंपरा के अनुसार बड़े और ज्वाइंट परिवार में रहना काफी अच्छा माना जाता है। मैं खुद भी संयुक्त परिवार में बड़ी हुई जिसमें चाचा,चाची और आधा दर्जन से भी अधिक मेरे कजन थे। 

इसलिए जब मेरे लिए शादी का रिश्ता एक बड़े बिजनसमैन घराने से आया जहां पूरा परिवार एक साथ रहता था तो ये मेरे लिए चिंता की बात नहीं थी। मैं काफी एक्साइटेड हो गई कि मैं एक ऐसे परिवार का हिस्सा बनने जा रही हूं जो बिल्कुल मेरे परिवार जैसा था। 

मैं सारे कजन में सबसे बड़ी थी। मुझे बड़ों जैसा व्यवहार करने की और सबका ख्याल रखने की आदत थी। मुझे लग रहा था कि मैं अपने परिवार की तरह उन्हें भी अपना लूंगी। चूंकि मेरा अरेंज मैरिज था इसलिए मुझे और मेरे पति को एक दोस्त की तरह समय बिताने का समय नहीं मिला। हम फैमिली द्वारा निर्धारित की गई कुछ डेट्स पर गए थे लेकिन हम इतना नहीं खुल पाए थे कि अपने परिवार से जुड़ी और भी बातों को जान सकें। हम एक दूसरे के साथ हमेशा अच्छा व्यवहार करते थे। 

शादी करने के बाद मैं भी नए घर में आई। सबकुछ शुरूआत में बिल्कुल परफेक्ट लगता थाएक आइडिल परिवार की तरह। मेरे सास ससुर के तीन बेटे हैं,उनकी पत्नियां बच्चे और एक बेटी जिनकी शादी नहीं हुई है। हम सभी साथ में रहते हैंरसोईघर भी कॉमन है और सच्चाई यही है कि कभी घर में उदास माहौल नहीं रहता था। 

प्यार नहीं..

लेकिन धीरे धीरे शादी का नयापन खत्म होते गया। मुझे समझ आने लगा कि चीजें उतनी अच्छी नहीं है जितनी लगती थी। मेरे पति भी संयुक्त परिवार के बिजनस का हिस्सा हैं जिसमें उनके पिता और भाई शामिल हैं। 

लगभग हर महीने भाइयों में बहस होती है कि कैसे दूसरा भाई फायदे के लिए अधिक मेहनत नहीं कर रहा है। मैंने गौर किया एक बार बहस के बाद इसका असर घर के बाकी सदस्यों पर भी पड़ता था। सभी एक दूसरे से बात करना बंद करते थे और एक दूसरे को उन मुद्दों को लेकर ताना मारते थे। 

मेरे लिए ये सब बिल्कुल नया था। मेरी जेठानी-देवरानियों ने पाया कि बिजनस को लेकर भाइयों में कलह हो रहा है तो वो इस निगेटिविटी को किचन तक लाती थी और जो बच्चे साथ में बड़े हो रहे थे उनपर भी इसका असर पड़ रहा था।

बद से बदतर

मैं पिछले चार सालों से संयुक्त परिवार में रह रही हूं और चीजें बद से बदतर होती जा रही है। चूंकि मैं टीचर हूं और मेरी बाकी देवरानी-जेठानी गृहणी हैं इसलिए अक्सर दोनों मुझ पर कमेंट करती हैं कि कैसे उन्होंने पूरा दिन परिवार का ध्यान रखा । मुझे पता होता है कि ये कमेंट मेरे लिए है। 

 

मेरी सास भी इस स्थिति को ठीक करने की कोशिश नहीं करती हैं। अगर मैं कभी कुछ अपनी दो साल की बेटी के लिए खरीद कर लाती हूं तो वो सबसे पहले बोलती हैं कि घर में तीन और बच्चे भी हैं। हां मैं मानती हूं कि घर में बच्चों के साथ सामान व्यवहार होना चाहिए लेकिन अगर मैं अपनी बेटी के लिए टूथ ब्रश खरीदूं तो भी मुझे बाकी बच्चों के लिए टुथब्रश खरीदना चाहिए जबकि उन्हें इनकी जरूरत नहीं है। 

इसके अलावा भी कई समस्याएं हैं। मेरे पति को भी परिवार के बिजनस से बराबर का फायदा होता है लेकिन हम कभी बाहर जाकर फिल्म देखने या डिनर के बारे में सोच भी नहीं सकते। चूंकि घर में बाकी भी सदस्य हैं इसलिए उम्मीद की जाती है कि हम सबको डिनर पर लेकर जाएं लेकिन आर्थिक रूप से ये संभव नहीं है कि इतने बड़े परिवार को हर सप्ताह बाहर डिनर पर लेकर जाया जा सके। 

छोटी छोटी बातों पर प्रतिस्पर्धा

घर की महिलाओं के बीच भी छोटी छोटी बातों को लेकर प्रतिस्पर्धा होती है। अगर मैं आज एक नई ड्रेस पहन लेती हूं तो अगले दिन मेरी देवरानियां शॉपिंग करने जाती हैं। अगर मेरे पति मेरे लिए कुछ अच्छा जेवर लेकर आएं तो मेरे ससुर उसे दिखाकर बोलते हैं कि बिजनस आगे नहीं बढ़ रहा है और हम अधिक खर्च कर रहे हैं। 

सिर्फ इतना ही नहींभले हमारा खुद का कमरा हो लेकिन मेरे पति की बहन जब चाहती है कमरे में बैठी रहती है जैसे उनका स्टडी रूम हो। कभी कभी वो लगातार देर रात तक कमरे में रहती है। मैंने कई बार अपने पति के साथ बात की और उन्हें कहा कि संयुक्त परिवार तभी खुश रहता है जब सभी एक दूसरे के स्पेस का ख्याल रखते हैं लेकिन बड़े होने के कारण वो सबको वो खुश रखना चाहते हैं। 

हम कभी भी कपल डिनर या छुट्टियों पर नहीं जा पाते। अगर हम कभी अपने प्लान शेयर भी करें तो मेरे ससुर कहते हैं कि कम से कम सभी बच्चों को लेकर जाएं ताकि खुद को नजरअंदाज ना महसूस करें।

दिखावटी प्रेम

मेरी चिंता ये है कि अगर हम एक दूसरे की खुशियों या उपलब्धियों में खुश नहीं हो सकते तो साथ रहकर नकारात्मकता फैलाने की कोई जरूरत नहीं है। इससे तो बेहतर है कि अलग रहा जाए और खास मौकों पर एक दूसरें की खुशियों का गला ना घोटें। 

मैं अपने पति को बोलती भी हूं कि हमें अलग रहना चाहिए लेकिन उन्हें परिवार को उदास करने का दुख होता है। साथ ही अभी वो आर्थिक रूप से इतने स्वतंत्र नहीं है इसलिए भी उन्हें डर होता है कि अलग ना कर दिए जाएं। 

इस नए संयुक्त परिवार में कभी भी मुझे ऐसा नहीं लगा कि सब एक दूसरे के सुख दुख में साथ हैं। ऐसा लगता है कि हम सब एक दूसरे को पीछे करने की कोशिश कर रहे हैं। 

कामकाजी मां का संकट

दो साल की बेटी की कामकाजी मां होने के नाते मुझे हमेशा डांटा जाता है कि मैं अपनी बेटी पर ध्यान नहीं देती। अगर मैं अपनी बेटी और पति के साथ बाहर जाना चाहती हूं तो मुझे ऐसा एहसास कराया जाता है कि मैं अपनी बेटी के साथ समय नहीं बिता पाने की भारपाई कर रही हूं। 

 

अगर मैं या मेरे पति कुछ खरीदते हैं तो हमें कहा जाता है कि हम उसकी कीमत सबके साथ शेयर करें। हमेशा हम क्या पहन रहे हैंखा रहे हैं और कैसे समय बिता रहे हैं इसपर नजर रखी जाती है। 

वीकेंड के समय मैं कोशिश करती हूं कि अच्छी नींद ले सकूं तो मेरी सास मुझे बेरुखी के साथ कहती हैं कि बाकी बहुएं किचन में काम कर रही हैं। 

सच बताऊं तो मैं सबको खुश करते करते थक गई हूं। मैं इंतजार कर रही हूं कि वो पल कह आएगा जब मैं काम से वापस घर पर आऊंगी और जूते चप्पल खोलकर एक कप चाय पी सकूंगी। अभी मैं ऑफिस से आते हीं किचन के काम में लग जाती हूं ताकि जो समय मैंने ऑफिस में बिताया उसकी भारपाई हो सके। 

अगर ये संयुक्त परिवार प्रणाली आपको दुख पहुंचा रहा है तो क्यों ना एक दायरा बना दिया जाएकभी कभी मैं अपने पति को समझाने की कोशिश करती हूं लेकिन तब तक मुझे इस बड़ेलेकिन तनाव से भरे परिवार में बनाये रखने की ज़रूरत नहीं होगी?

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