“हाँ मैं एक बेटा चाहती हूं...और इसका मेरी सोच से कोई लेना देना नहीं है”

क्या ‘सपोर्ट द गर्ल चाइल्ड’ का ये मतलब होता है? क्या बेटे की चाह रखना वाकई हमारे देश में गुनाह है?

पिछले सप्ताह कुछ ऐसा हुआ कि मैं सोच में पड़ गई और काफी परेशान भी हुई। फेसबुक की एक मम्मी ग्रुप में एक सिंपल सा पोस्ट था जिसमें एक सदस्य ने इच्छा जाहिर की थी कि उसे एक बेटा चाहिए और वो पहले से एक बेटी की मां थी। उसका कहना था कि अगर अगला बेबी बेटा हुआ तो उसका परिवार पूरा हो जाएगा।

अब सवाल ये कि इसमें गलत क्या है? मेरा मानना है कि ये उसके निजी पसंद है, अगर उनका पहला बेबी लड़का भी होता तो भी ये मां की पसंद है कि वो क्या चाहती है।  

लेकिन क्या इसका मतलब ये है कि बिना कोई भी कारण जाने हम उसे बुरा भला कहें और मान लें कि उसकी सोच पिछड़ी हुई है?

जी हां बिल्कुल, कुछ ऐसा ही हुआ। सभी माएं उसपर टूट पड़ीं कि वो एक बेटा चाहती है। यहां तक कि उसे अनपढ़ और रूढ़िवादी भी कहा गया। कई सक्रिय माएं तो उसे महिला जन्म दर कम होने के पीछे जिम्मेदार भी मानने लगी।

और सच की बात की जाए तो वो किसी को पता नहीं (या जानने की कोशिश की) था कि वो कौन थी, कहां से आई थी, उसकी क्या सोच थी, क्या कहना चाह रही थी और लोग बस उसे कोसने लगे।

क्या बेटे की चाह रखना कोई गुनाह है?

ये सब मेरी आखों के सामने हुआ था और मेरे पास मेरा सर पीटने के अलावा कोई चारा नहीं था। क्या सपोर्ट द गर्ल चाइल्ड का ये मतलब होता है? जब चाहें किसी को कहीं भी भला बुरा बोलें। क्या बेटे की चाह रखना वाकई हमारे देश में गुनाह है।

तो क्या इसका मतलब है कि जिन महिलाओं की सोच आधुनिक है उन्हें सिर्फ बेटी की चाह रखनी चाहिए? और जो बेटे की चाह रखते हैं वो अनपढ़, पिछड़े हैं! क्या आप भी ऐसा सोचते हैं?

 

मुझे माफ कर दीजिए लेकिन मैं ऐसा नहीं सोचती हूं। मेरी एक 6 साल की बेटी है और अगर कभी भी मुझे एक और बच्चे की चाह होगी तो मैं बेटा ही चाहूंगी। इसलिए नहीं क्योंकि मैं अनपढ़ हूं, या फिर मेरे परिवार का मुझपर दबाव है, इसलिए भी नहीं कि क्योंकि मैं लड़कियों का पक्ष नहीं लेती और इसलिए तो बिल्कुल भी नहीं कि मेरी रूढ़िवादी सोच है।

मैं बेटा चाहती हूं क्योंकि...

मैं चाहती हूं कि मेरा एक बेटा हो क्योंकि..क्योंकि बस मैं चाहती हूं। ये बहुत साधारण बात है। मुझे लड़कियों से भी प्यार है लेकिन मुझे लड़कों से भी प्यार है। मैं उसे भी उतना ही प्यार करूंगी जितना अपनी पहली बेबी मेरी बेटी से करती हूं।

मैं इस बात को सुनिश्चित करूंगी कि उसका पालन पोषण मैं एक लिंग-निष्पक्ष माहौल में करूं। उसे और उसकी बहन को बराबर प्यार दूं। मैं उसे बताऊंगी कि महिलाओं के साथ कैसे पेश आते हैं क्यों उन्हें सपोर्ट करना चाहिए।

मैं लड़कियों के परिवार से आती हूं (हम चार बहनें हैं) और कहने की जरूरत नहीं है कि मुझे लड़कियों से कोई समस्या नहीं है। मैंने देखा है कि कैसे मेरा इकलौता भाई धीरे-धीरे अपनी बहनों की इज्जत करना सीखा और सबको बराबरी की नजरों से देखता था। उसे सिखाया गया था कि लड़का होने से कोई विशेष अधिकार नहीं मिलता है इसलिए जब कामवाली नहीं आती थी मैं खाना बनाती थी और वो फर्श साफ करता था।

उसे घर आए लोगों की आवाभगत करना, बहनों के लिए सामान लेना, साधारण शब्दों में उसे ना सिर्फ घर के बाहर बल्कि घर में भी महिलाओं को बराबर का दर्जा देने सिखाया गया। 

मुझे एक बात और बताइए, अगर आप बेटी की चाह रखती हैं और बेटे का जन्म हो तो क्या आप मां नहीं कहलाएंगी? क्या आप उसे अपने दिल के टुकड़े जैसा नहीं मानेंगी? क्या आपके लिए तब लड़का या लड़की बराबर नहीं होगा। क्या देश में ये जरूरी नहीं है कि हर शख्स पहले एक स्वस्थ्य बेबी (और मां) की चाह रखे ना कि बेटे या बेटी की।

महिलाएं जो मां बनने वाली हैं, अगर अगली बार कोई आपसे पूछे कि आप क्या चाहती हैं तो खुद की सुनें। अगर आप बेटा चाहती हैं तो बोलें और खुद से वादा करें उसका अच्छे से पालन पोषण करेंगी और बेहतरीन सोच देंगी।

मैं अपनी सभी मम्मी फ्रेंड से भी कहना चाहती हूं कि कृप्या अगर कोई बेटा चाहता हो तो उसे बुरा भला ना कहें। होने वाली मम्मी को शुभकामनाएं दे और कि वो अपने सबसे खूबसूरत सफर मातृत्व का आनंद उठाएं।

उनकी मदद करें और उनके साथ रहें। सिर्फ शब्दों से नहीं बल्कि अपने काम से भी क्योंकि जो भी मां बनने वाली होती हैं उन्हें बहुत सारा प्यार और सपोर्ट की जरूरत होती है, ठीक उतना ही जितना जन्म लेने वाले बेबी को होता है।

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