"मेरी नॉर्मल डिलिवरी में तो कुछ भी नॉर्मल नहीं था"

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मुझे अपनी बेबी को जन्म दिए पांच महीने हो गए और अभी भी ठीक से रिकवर होने में काफी समय लगेगा।

मेरे 9 महीने की प्रेग्नेंसी मेरे लिए काफी मुश्किलों भरा नहीं था (जाहिर है कि पहली तिमाही के बाद आपका शरीर के अंदर छोटा सा बेबी बड़ा होता है, मॉर्निंग सिकनेस, दिल में जलन, थकावट होना आम बात थी और साथ ही हार्मोनल बदलाव)

मैं काफी खुश थी कि मैं आखिर समय तक काफी एक्टिव रही थी। मैं शारीरिक रूप से काफी फिट थी ( योगा की बदौलत) और मैं अपनी बहुत नॉर्मल लाइफ जीती थी। मेरा वजन बढ़ गया था और मैं थक भी जल्दी जाती थी लेकिन इसके अलावा मुझे कोई भी स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या नहीं हुई।

मुझे अपनी बेबी को जन्म दिए पांच महीने हो गए और अभी भी ठीक से रिकवर होने में काफी समय लगेगा।

मेरे बेबी की डिलिवरी में दस दिन बाकी था…

मुझे अच्छे से याद है कि 15 दिसंबर 2016 का दिन था, मेरी बेटी के जन्म से ठीक एक दिन पहले।मेरे पति और मैं डिनर कर चुके थे। लगभग 9:30 से लगातार तेज किक की शुरूआत हुई। मुझे लगा कि ये नॉर्मल है क्योंकि मैं उसी दिन डॉक्टर से मिलकर आई थी। डॉक्टर ने भी कहा था कि अभी बेबी के आने में लगभग दस दिन बाकी है।

जैसे जैसे रात बढ़ती गई, किक और ज्यादा तेजी से बढ़ता गया। चूंकि मुझे सोने में काफी समस्या रही थी इसलिए हम 2:30 तक बैठ कर बातें करते रहे। उस दिन मैंने सपना देखा था कि मेरा वॉटर ब्रोक एलिवेटर पर हो गया। मैं शॉक में सोकर 3 बजे के आसपास उठी थी फिर मुझे एहसास हुआ कि ये हकीकत नहीं सपना है। मैं धीरे धीरे उठकर बाथरूम में चेक करने गई तो देखी कि लगातार ब्लड और चिपचपा फ्लूयिड स्त्राव हो रहा था। मैं नहीं डरी क्योंकि मुझे पता था कि अब अस्पताल जाने का समय हो गया है। मुझे पता चल गया था कि वो बस आने वाली है।

 

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Artwork courtesy: Indu Harikumar for the India Birth Project

मैं किसी भी तरह नॉर्मल डिलिवरी चाहती थी

मैं अस्पताल में थी और मुझे प्रसव के लिए तैयार किया जा रहा था। मैंने पैरेंटल योगा में जो सांस लेने की टेक्निक सीखी थी वो लगातार कर रही थी। मैं जो भी योगा डिलिवरी के लिए सीखी थी वो अपना मैट निकालकर लगातार कर रही थी क्योंकि मैं हर हाल में नॉर्मल डिलिवरी चाहती थी।

मैंने पूरी प्रेग्नेंसी के दौरान कई कहानियां पढ़ चुकी थी जिसमें महिलाओं को सी-सेक्शन के बाद वापस फिट होने में काफी समय लग जाता था। मैंने ये भी पढ़ा था कि कैसे भारत में अस्पतालों में जबरदस्ती पैसे के लिए ऑपरेशन किया जाता है। मैंने ये भी पढ़ा था कि सी-सेक्शन के बाद कैसे महिलाएं अपना वजन नहीं कम कर पाती हैं।

मुझे लगा कि नॉर्मल डिलिवरी सबसे आसान उपाय था जिससे मैं प्रसव के बाद अच्छे अनुभव ले सकती हूं। मुझे ये बहुत ज्यादा अच्छे से नहीं पता था कि भारत में नॉर्मल डिलिवरी में कुछ भी नॉर्मल नहीं रह जाता है।

मुझे 8 बजे सुबह के आसपास लेबर रूम में ले जाया गया। तब तक तीन सेमी का फैलाव आ चुका था और दर्द बहुत ही अधिक हो रहा था।मैं चार घंटे से अस्पताल में थी और एक प्रकार के  एनिमिया की वजह से कई सारे टेस्ट हो रहे थे। मैं लगातार चिल्ला रही थी और किक लगातार किए जा रही थी कि शायद दर्द थोड़ा कम हो जाए लेकिन कुछ भी करने से आराम नहीं मिल रहा था।

स्थिति को और भी खराब करने के लिए मुझे Pitocin IV का डोज दिया गया क्योंकि मेरा बेबी जन्म देने वाली नलिका में अवतीर्ण नहीं हो पाया था। मैं इस समय तक दर्द के दसवें लेवल तक पहुंच चुकी थी। मैं बस चिल्लाए जा रही थी और नर्स बस थोड़ा और थोड़ा और बोल के शांत करने की कोशिश कर रही थी।

मेरे पति को साथ रहने से मना किया गया

मेरे पति को मेरे आस पास आने से मना किया गया गया। वो पूरा शो कुछ दूरी पर खड़े होकर देख रहे थे। वो लगातार विनती कर रहे थे कि उन्हें मेरे पास आने दिया जाए लेकिन किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। वो बस मेरा हाथ पकड़कर मुझे कहना चाहते थे कि तुम ठीक हो जाओगी। उन्हें कई बार रूम छोड़कर जाने भी कहा गया। ये सब तब हो रहा था जब मैं वहां दर्द में लेटी चिल्ला रही थी।

9:30 बजे सुबह तक मेरा शरीर जवाब देने लगे। मैं देख पा रही थी कि शायद बिना किसी परेशानी की डिलिवरी संभव नहीं था जबकि मैं शुरूआत से चाहती थी कि डिलवरी बिना किसी समस्या के हो। Pitocin के स्ट्रॉन्ग डोज के कारण मेरा शरीर प्राकृतिक रूप से डिलिवरी नहीं कर पा रहा था। मैं अब और दर्द नहीं बर्दाश्त कर पा रही थी इसलिए मैंने एपिड्यूरल के लिए विनती की ।

कुछ ही मिनटो के बाद मैं बिल्कुल सुन्न और दर्द रहित पड़ गई। मुझे फिर से दर्द का एहसास हुआ। तब तक 8 सेमी का फैलाव आ चुका था लेकिन बेबी अभी तक नहीं आ पा रहा था। मुझे फिर से Pitocin दिया गया और साथ एपिड्यूरल भी।

आखिरकार लगभग 11:15 में डॉक्टर ने कहा कि मैं अब बेबी को ढकेलने की कोशिश करूं। लेकिन मैं क्या push करती और किसे धक्का देती जब मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। एक समय ऐसा भी आया जब मेरी एनेस्थेटिस्ट जो लगभग 100 किलो की होगी, लगभग मेरे पेट पर बैठकर बेबी को ढकेलने का प्रयास करने लगी।

आखिरकार 11:39 बजे मुझे हल्की सी रोने की आवाज आई। मैंने अपनी आंखे बंद कर ली और मेरी डॉक्टर ने कहा कि वो अब टांके लगाएगी। उसे Episiotomy भी करना पड़ा था (योनि में एक चीरा लगाना) ताकि बेबी बाहर आ पाए। मैंने पहले की मीटिंग में साफ साफ कहा था कि मैं कोई Episiotomy नहीं चाहती हूं लेकिन मुझे बोला गया था कि ये भारत में ये एक अच्छा तरीका है। काश मैं तब और विरोध कर पाती।

चूंकि मैं उसे सीधा उसे खुद अपने शरीर से लगाना चाहती है, डॉक्टर ने बेबी को 30 सेकेंड के लिए मेरी छाती पर रखा और फिर उसे साफ करने ले गई। मुझे याद है कि एनेस्थिस्ट कैसे मेरी विश का मजाक उड़ा रही थी।

लगभग 10 सेमी के चीरा के कारण काफी खून बह चुका था और मेरा हेमोग्लोबिन 12 से सीधे 6 पर पहुंच गया था । मुझे  दो बोतल हेमोग्लोबिन चढ़ाया गया और जब भी उससे भी काम नहीं बना तो RBC ब्लड चढ़ाया गया। मैं अस्पताल एक दिन ज्यादा रूकी और IV से जुड़े होने के कारण मैं बेबी को उठा भी नहीं पाती थी।

इतनी सारी चीजें चढ़ाने के बाद मेरी दोनों हाथों की नसें क्षतिग्रस्त हो गई थी कि मैं हाथ उठा तक नहीं पाती थी। इसके अलावा कई और समस्याएं जैसे थोर्मबोफ्लिबिटिस, दर्द, coccyx और perineum जैसी कई समस्याएं हो रही थी। लेकिन मेरी बेटी का मुस्कुराता चेहरा सबकुछ सहने की शक्ति दे रहा था। इसके अलावा मुझे परिवार और दोस्तों का भी भरपूर साथ मिल रहा था।

अब मेरी बेटी पांच महीने की है।  मैंने हर एक दिन उसे स्तनपान कराया, चाहे वो IV सुई पर रहना हो, मैं दो महीने तक सीधे पांच मिनट के लिए बैठ भी नहीं पाती थी लेकिन ब्रेस्टफीडिंग को जारी रखा। अभी भी मुझे काफी दर्द से गुजरना पड़ता है लेकिन सबसे ज्यादा तकलीफ अपनी बच्चे के प्रति  मां की जिम्मेदारी ना पूरी कर पाने की थी।

मैंने हमेशा कोशिश की मैं अपनी बेबी की एक अच्छी मां और केयरटेकर बनूं लेकिन मुझे पता है कि मैं और भी अच्छा कर सकती थी। मेरी प्रसव के बाद के अनुभव भी प्रेग्नेंसी जितने अच्छे हो सकते थे। ये दुखदायी है कि मां जैसे चाहें वैसे बेबी को जन्म नहीं दे सकती हैं। ये भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि जन्म देने का अधिकार भारत में बस मजाक बनकर रह गया है।

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Source: theindusparent