“मेरी बेटी 10 बजे के पहले कभी नहीं सोती और मुझे इससे समस्या नहीं है..जानिए क्यों”

हम अक्सर सुनते हैं कि सभी बच्चे अलग-अलग होते हैं, लेकिन क्या हम रूटीन बनाने से पहले असल में समझ पाते हैं कि बच्चों के लिए क्या सही है या फिर बस उस नियम का पालन करने में लग जाते हैं ?

अगर आप मुझे जानते हैं या मेरे लेख हमेशा पढ़ते हैं तो आप समझ चुके होंगे कि मैं टिपिकल भारतीय मां नहीं हूं। मैं पैरेंटिंग के पुराने नियमों को भी मानती हूं जहां शानदार जन्मदिन की पार्टी, अतरिक्त पाठ्येतर गतिविधि नहीं होती थी और हेल्दी लाइफस्टाइल को महत्व दिया जाता था।

असल में जब हम बच्चे थे तो हमारी बहुत ही सिंपल लाइफ थी जिसमें बोरियत थी लेकिन हम बच्चे फ्री समय को कैसे बिताया जाए इसका रास्ता निकाल ही लेते थे। मैं ये नहीं कह रही हूं कि आपको सचेत नहीं रहना चाहिए लेकिन कुछ भी ऐसा सिर्फ इसलिए ना करें क्योंकि सभी वो कर रहे हैं या फिर परवरिश को कोई किताब ऐसा करने कह रही है। ये एक मां के तौर पर मेरे लिए संभव नहीं है।

अगर परवरिश के नियमों की बात करें तो एक चीज जो हर यंग मां मानती है और करती है वो ये कि अपने बच्चों में जल्द से जल्द सोने की आदत डालती है। मैं मानती हूं स्वस्थ्य शरीर और मन के लिए अच्छी नींद जरूरी है लेकिन मेरा मानना है कि 8 बजे बच्चे को बिस्तर पर डाल देने से समस्या हल नहीं हो जाती है और इसके लिए मेरे पास कारण भी हैं।

भारतीय ढांचे में ये संभव ही नहीं है?

मेरा मानना है कि अगर आप परंपरागत भारतीय परिवार से हैं जहां 8-9 बजे रात का खाना खाते हैं तो आप खाना खत्म करते ही बच्चे को कैसे सोने दे सकते हैं। क्या हमें उन्हें 6 बजे खाना दे देना चाहिए? क्या आपको नहीं लगता कि यह बहुत ही आधारहीन है।

दूसरी बात, अगर आपका बच्चा दोपहर मे सोता है तो आप कैसे बच्चे को 8 बजे सोने के लिए कह सकते हैं जब उसे दूर दूर तक नींद नहीं आ रही हो। 

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अगर आपको लगता है कि ये बातें मैं बस ऐसे ही कह रही हूं तो सबसे पहले मैं आपको बता दूं कि मेरी बेटी जैसे ही 3 साल की हुई थी, मैं भी उसे 8 बजे सुलाने की आदत डालने के कोशिश कर चुकी हूं लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ।

मैं एक कामकाजी मां हूं और अपनी बच्ची को डे केयर से 6:30 के आसपास लेने जाती हूं। 8 बजे सोने का मतलब है कि घर पहुंचते हीं 7 बजे तक खाना खा लेना। हम घर पहुंचते हैं और एक घंटे में वो अपना होमवर्क पूरा करती है फिर सोने से पहले थोड़ा आराम करती है।

लेकिन..वो नहीं सोती थी!

हम काफी समय तक कोशिश करते रहे कि वो 8 बजे तक सो जाए और उसे नींद आ जाए, इसके लिए मैं हर संभव प्रयास करती थी चाहे कहानी सुनाना हो, म्यूजिक, या लोरी सुनाना हो। कई बार तो मैं सो जाने की एक्टिंग भी करती थी।

मैं कितनी भी कोशिश करती थी लेकिन मेरी बेटी नहीं सोती थी। वो 10 बजे तक जागी रहती थी और मुझे एक और कहानी सुनाने के लिए कहती थी। इसके बाद भी उसे नींद नहीं आती थी बल्कि वो एक्टिव रहती थी ।

धीरे धीर 8 बजे उसे सुलाना एक कठिन कार्य हो गया जिससे मैं सिर्फ परेशान होती थी और मेरी बेटी को लगता था कि मम्मा का मूड अच्छा नहीं है।

धीरे-धीरे मुझे समझ आया कि इसकी कोई जरूरत नहीं थी। हम अक्सर सुनते हैं कि हर बच्चा अलग होता है लेकिन क्या हम समझ पाते हैं कि बच्चे को पसंद है और वो किस चीज में सहज हैं। हम सिर्फ नया रूटीन फॉलो करने लगते हैं क्योंकि वो एक नियम बन चुका है?

 
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मैंने नियमों को बदला...

मुझे समझ आ गया कि 8 बजे सोना मेरी बेटी को पसंद नहीं था क्योंकि उसका मन ही नहीं होता था इसलिए मैंने नियमों को बदल दिया। वो जो करना चाहती थी मैंने उसे करने दिया और आप यकीन मानिए इसके बाद हम किसी तरह के दवाब में नहीं थे।

हम काफी केयरफ्री हो गए। मेरे बेटी भी आराम से पहले खाती है और फिर होमवर्क करने बैठती है। इसके बाद वो खेलती है या अपनी पसंदीदा किताबें पढ़ती है। 9:30/10 बजे वो मेरे पास बैठती है और बताती है कि उसका दिन कैसा रहा और उसने दिनभर क्या किया।

हमारे पास करने के लिए ढेर सारी बातें होती है। डे केयर, दोस्त, और फिर उसे खुद ही नींद आने लगती है। मुझे कुछ भी करने की जरूरत ही नहीं पड़ती।

अभी वो 6 साल की है और ये हमारा सबसे पसंदीदा समय है जो हम सोने जाने से पहले एक दूसरे के साथ बिताते हैं। ये सिर्फ हमारासमय होता है। सिर्फ मेरा और मेरी बेटी का।

सच्चाई तो ये है कि कोई भी मां परफेक्ट नहीं होती है और बात जब परवरिश की हो तो कुछ भी सही या गलत नहीं होता है। मुझे खुशी है कि मैंने 8 बजे सोने के नियम को बदला और वो किया जो मेरी बेटी को पसंद है। आप क्या करती हैं? अपनी कहानी हमारे साथ जरूर शेयर करें।