मां बनने के बाद कहीं आप लगातार अपराधबोध की शिकार तो नहीं हो रहीं...जानिए

मातृत्व अपनाने के बाद से मेरा पूरा ध्यान अपने शिशु पर ही रहा और जब कभी भी मैं अपने शिशु को कुछ घंटे के लिए छोड़ कर बाहर गई...तो वहां भी मैं अपना ध्यान ज़रुरी कामों पर केंद्रित नहीं कर पाती थी ।

मां बनने के बाद से आपको यही चिंता सताते रहती है कि कैसे अपने शिशु का बेहतर ख्याल रखा जाए । शिशु के लिए दिन भर मेहनत करने और कई रात जागने के बाद भी एक मां का दिल अपने कर्तव्यों को लेकर संतुष्ट नहीं रह पाता है ।

हमेशा अपने छोटे से बच्चे को सुंदर भविष्य देने, उनके अच्छे स्वास्थ्य के लिए तमाम कोशिश करने के अलावा बच्चे के लुक्स को लेकर सजग रहने के बावज़ूद भी अगर आप पड़ोस की यंग मॉम के द्वारा अपने शिशु के लिए किए जा रहे प्रयासों को बेहतर मान रही हों तो आपको अब इस धुन से बाहर निकलने की ज़रुरत है।

जी हां, एक मां के तौर पर आपको अपनी तुलना किसी से नहीं करनी चाहिए क्योंकि आप जो अपने शिशु के लिए कर पा रहीं हैं वही उसकी बेहतर परवरिश है और उसकी खुशहाली के लिए काफी है । आपका शिशु भी मां को खुश देखना ही चाहेगा इसलिए इसमें कोई बुराई नहीं कि आप ‘ओवर वरीड या ओवर थिंक’ करने की बजाए खुद के लिए भी जीयें और अपने आपको अपराधबोध की भावनाओं से हरसंभव बचाने का प्रयास करें ।

 

शायद आपका भी किस्सा मुझसे मिलता-जुलता हो !

मातृत्व अपनाने के बाद से मेरा पूरा ध्यान अपने शिशु पर ही रहा और जब कभी भी मैं अपने शिशु को कुछ घंटे के लिए छोड़ कर बाहर गई...तो वहां भी मैं अपना ध्यान ज़रुरी कामों पर केंद्रित नहीं कर पाती थी ।

मेरे कानों में उसके रोने की आवाज़ इस तरह बसी हुई थी कि जब भी वो मुझसे दूर होता था चाहे वो बड़े आराम में ही क्यों ना हो, फिर भी मुझे उसके तकलीफ में होने जैसी आशंकाएं घेरी रहती थी । ये हास्यापद नहीं सच्चाई है कि हर नई मां की तरह मुझे भी स्नान करने के दौरान ऐसा महसूस होता था कि शिशु रो रहा है और जब मैं तुरंत बाहर आकर उसे देखती तो वो चैन से सो रहा होता था।

मैंने अधिकांश रुप से अकेले ही अपने बच्चे की देखभाल की है और इसलिए शायद हमेशा उसके साथ होना मेरी भी आदत बन चुकी है । अब जब वो 2 वर्ष का होने जा रहा है तो भी अगर मैं उसके बिना कहीं बाहर जाऊं तो मुझे सूनापन महसूस होता है ।

लेकिन ये भी सच है कि गोद के खाली होने पर हल्का-हल्का सा फील करती हूं , अलग सी आज़ादी महसूस होती है।ये जानते हुए भी कि बच्चा घर पर अच्छी देखरेख में सुरक्षित है फिर भी बच्चे के बारे में ही सोचते हुए मैं उसे साथ ना लाने के अपराधबोध से भर जाती हूं ।

लेकिन अब मुझे यह स्वीकारने में संकोच नहीं कि पति की मदद से, धीरे-धीरे मैंने इस गिल्ट से खुद को बाहर निकालना शुरु कर दिया है और बच्चे को कुछ समय के लिए उसके पिता या गैंड पैरेंट्स के पास रख कर मैं अपने दोस्तों से मिलती हूं, वॉक पर जाती हूं या खुद को वक्त देती हूं बिल्कुल वैसे ही जैसे पहले दिया करती थी...मैंने महसूस किया है कि ये मेरे और बच्चे दोनों के लिए अच्छा बदलाव था ।

बेबी आने के बाद पति से केमेस्ट्री ना बिगड़े !

क्या आपने कभी सोचा है कि कई बेहतरीन रिश्ते शिशु आने के बाद उतने मधुर क्यों नहीं रहते । दरअसल हर संबंधों को समय की इन्वेस्टमेंट चाहिए । शादी के बाद तो आप पति को भरपूर अटेंशन देती हैं लेकिन बेबी के आ जाने के बाद आपसी दूरियां बढ़ने लगती हैं जिससे कहीं ना कहीं तनाव का माहौल पनपने लगता है।

कई बार तो हम सिर्फ बच्चे के बारे में सोच कर, परेशान होकर बड़ी मुश्किल से पाए ख़ास पलों का मज़ा ख़राब कर देते हैं ।.क्या कभी पति के साथ लंबे समय के बाद डिनर डेट पर जाने के बाद शिशु से दूर आ जाने का अफसोस नहीं हुआ है आपको...और इस तरह उनसे मुख़ातिब होने की बजाए आपका पूरा ध्यान घर पर ही रह जाता है और आप अपराधबोध करने लगती हैं । यकींन मानिए आपको भी पूरा हक़ है अच्छा महसूस करने,या पति के साथ सुकुन भरे लम्हें बिताने का ।

ज़िम्मेदारियों का बोझ हल्का करें

जरुरी नहीं कि हमेशा शिशु पर ही ध्यान केंद्रित किया जाए, उन्हें जब आपकी ज़रुरत हो आपको बेशक उनका ख्याल रखना चाहिए लेकिन इसमें कोई बुराई नहीं है कि आप किसी विश्वासी या दादा-दादी या फिर नैनी के साथ अपनी ज़िम्मेदारी बांटे । खास कर जब पति के पास वक्त हो तो उनसे बच्चों की देखरेख का काम ज़रुर शेयर करें ।

इस तरह वो शिशु का ध्यान रखने में अपना वक्त लगा पाएंगे और आप थोड़ा खुद पर ध्यान दे पाएंगी या फिर किसी दोस्त से बातचीत कर मन हल्का करने के लिए फ्री रहेंगी । अगर आप वर्किंग वुमेन ही रहना चाहती हैं तो भी आपको मदद मिलेगी । कहने का मतलब ये है कि शिशु में ऐसी आदत ना विकसित करें कि उसकी सारी ड्युटी सिर्फ आप से ही पूरी हो ।

इस तरह आप शिशु और पर्सनल रिश्तों के बीच तालमेल बिठा कर एक खूबसूरत और तनाव मुक्त जीवन जी सकती हैं