महाशिवरात्रि को आदिदेव महादेव एवं शक्तिस्वरुपा महादेवी की विशेष पूजा के पीछे छुपे रहस्य जानिए

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महाशिवरात्रि का शिव भक्तों के बीच बड़ा महत्व है । इसी दिन शिव और पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था । इसलिए विभिन्न शिव मंदिरों में महाशिवरात्रि के दिन शिव-पार्वती का विवाह भी करवाया जाता है ।

शिव को देवों के देव महादेव कहा जाता है । यही एक मात्र ऐसे देवता हैं जिन्हें हर कोई पूजता है चाहे स्त्री हो या पुरुष,असुर हो या संत, यहां तक की भूत-पिशाच भी शिव की भक्ति में लीन रहते हैं । शिव आदिकाल से ही इस सृष्टि के समस्त जीवों के पालनहार रहे हैं । ऐसी मान्यता है कि सृष्टि की रचना के समय शिवरात्रि के मध्यरात्रि को भगवान शंकर का रुद्र रुप में अवतरण हुआ था । महाशिवरात्रि के अवसर पर भगवान भोलेनाथ एवं माता पार्वती अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं ज़रुर पूर्ण करते हैं ।

महादेव की असीम कृपा पाने के लिए महाशिवरात्रि के दिन प्रदोष काल में उनकी विधिवत पूजा करनी चाहिए जिसमें शिव को प्रिय सभी वस्तुएं जैसे बेल-पत्र, भांग, धतूरा, गंगाजल, दूध और घी, दूब , चन्दन   भभूत आदि चढ़ाना चाहिए । शिव नाम का जाप करना चाहिए एवं आदि शक्ति महादेवी पार्वती की पूजा में सिन्दूर अवश्य चढ़ाना चाहिए । कहते हैं कि इस दिन कुंवारी लड़कियों को अच्छे जीवनसाथी के लिए शिव और गौरी की आराधना करनी चाहिए ।                            

महाशिवरात्रि: क्यों है यह दिन ख़ास

आपको बता दें कि पौराणिक परंपरा के अनुसार फाल्गुन मास की त्रयोदशी के दिन शिवरात्रि को उत्सव के रुप में मनाया जाता है । महाशिवरात्रि का शिव भक्तों के बीच बड़ा महत्व है । कहा ये भी जाता है कि इसी दिन शिव और पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था । इसलिए विभिन्न शिव मंदिरों में महाशिवरात्रि के दिन शिव-पार्वती का विवाह भी करवाया जाता है ।

इस पर्व के पीछे का एक कारण ये भी माना जाता है कि महाशिवरात्रि के दिन ही शिव ने समुद्र मंथन के बाद प्राप्त हुए कालकूट विष  को अपने कंठ में रख लिया था । विष के प्रभाव से नीले पड़े कंठ के कारण ही तो उन्हें नीलकंठ भी कहा जाता है ।  इस तरह उन्होंने समस्त देव लोक एवं संपूर्ण सृष्टि का संहार होने से रोक लिया ।

ऐसी मान्यता है कि इसी दिन ब्रह्मदेव की भौंहों से शिव जी का रुद्र रुप प्रकट हुआ था । आपने शिव के तांडव नृत्य के बारे में तो सुना ही होगा । कहते हैं कि महाशिवरात्रि के प्रदोष काल में शिव ने अपने रुद्र रुप में तांडव किया और तीसरी नेत्र से विनाश लीला रची । तांडव के दौरान डमरु के स्वर पर ही तो रावण ने शिव तांडव स्तोत्रम की रचना की थी।  

अविनाशी हैं घट-घट वासी

src=https://hindi admin.theindusparent.com/wp content/uploads/sites/10/2018/02/shivratri2.jpg महाशिवरात्रि को आदिदेव महादेव एवं शक्तिस्वरुपा महादेवी की विशेष पूजा के पीछे छुपे रहस्य जानिए

महाशिवरात्रि के दिन शिव अपने सच्चे भक्तों के पास ज़रुर पहुंचते हैं उनके हर शिव-लिंग में इस दिन उनका वास होता है । सुहागनों को पति की लंबी उम्र के लिए आशुतोष भगवान शिव की विशेष पूजा करनी चाहिए । शिव भयानक रोग से रक्षा करते हैं और जिस तरह उन्होंने क्षय रोग से ग्रसित चंद्रमा को मृत्युशैया से जीवित कर अपने माथे पर धारण किया उसी तरह वो अपने सभी भक्तों की पुकार सुन कर उन्हें जीवनदान देते हैं ।

पौराणिक कथा

एक समय की बात है जब एक शिकारी शिकार की तलाश में तलाब के किनारे गया और वही बेल के पेड़ पर चढ़कर बैठा रहा । पेड़ की शाखाओं पर इतने पत्ते लगे थे कि उसे शिकार पर नज़र रखने में परेशानी हो रही थी इसलिए वो धीरे-धीरे कई पत्ते तोड़कर नीचे गिराने लगा । सौभाग्यवश पेड़ की जड़ में एक शिवलिंग भी था जिसके ऊपर सारे बेलपत्र गिर रहे थे।

इतने में हिरण का झुंड पानी पीने तालाब के किनारे पहुंचा । शिकारी ने जैसे ही हिरण पर निशाना साधा हिरणी ने गुहार लगाई कि कृपया उसे एक बार अपने बच्चों से मिलने की मोहलत दे दें उसके बाद वो शिकार के लिए स्वंय ही उपस्थित हो जाएगी। शिकारी ने उसे जाने की अनुमति दे दी और उसके लिए पेड़ पर बैठ रात भर इंतज़ार किया ।

शिवरात्रि की तिथि को इस तरह अनजाने में ही सही पर अन्न के आभाव में उसने व्रत भी रखा, पूरा रात जागरण भी किया और शिव को सबसे प्रिय ब्रेलपत्र भी चढ़ाया । शिव की असीम अनुकंपा से उसका हृदय परिवर्तित हो गया और वो रातो-रात क्षमा दया की भावनाओं से भर गया । सुबह से पूर्व जब हिरणी उसके समक्ष उपस्थित हुई तो वो उसकी जान ना ले सका ।

शिव उसकी दया भाव से प्रसन्न हुए और उसे अपने शरण में ले गए। मान्यता है कि आज भी उस शिकारी और हिरणी को रात में तारों के बीच मृगशीर्ष नक्षत्र के रुप में देखा जाता है ।