भारत में school board कैसे चुनें ?

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भारत में विद्यालय बोर्ड पर क्या विवाद है ? क्या आपका बोर्ड का चुनना आपके स्टेटस से जुड़ा मामला है ? पढ़िए

हम अपनी बेटी के लिए एक स्कूल की तलाश में थे । हमने इंटरनेट पर सर्च किया तो एक वेबसाइट पर नज़र गयी जिसमे बताया जा रहा था की कौन सा बोर्ड एक दूसरे से बेहतर है या बुरा है । वहां बताया जा रहा था की आपका स्कूल का बोर्ड का आपका बच्चा आगे जाकर क्या बनेगा उसपर असर डालता है । अब स्कूल की भाग दौड़, इंटरव्यू आदि से परेशान होने के अलावा अपने 3 फुट के बच्चे को क्या बनाना है उसकी चिंता में पड़ गया ।

ऊपर से पड़ोसियों की बातें " मेरी बेटी 12वीं के बाद डॉक्टरी की पढ़ाई करेगी इसीलिए मैं उसे सीबीएसई बोर्ड से पढ़ाऊंगा" वो अपने 2 साल के बच्चे के बारे में बोल रहे थे जो अभी ठीक से एक वाक्य नहीं बोल सकती । अब मुझे झटका लगा ।

या तो मैं पाषाण युग में चली गया हूँ जहाँ जहाँ बच्चे स्कूल जाते थे, दोस्त बनाने, पढ़ने, मस्ती करने, फिर बाद में वो सोचते थे की उन्हें क्या बनना है । अगर ये भारत में शिक्षा व्यवस्था की वर्तमान स्थिति है तो माता पिता कोसे तय कर पाएंगे की उनके बच्चे के लिए कौन सा बोर्ड बेहतर है ? क्या स्कूल का बोर्ड तय करेगा की बचा अंतरिक्ष यात्री बनेगा या पेंटर ? इन बोर्ड के पाठ्यक्रम कितने अलग हैं ?

इन सबसे तंग आकर मैंने भारत के सभी मुख्य बोर्ड के ऊपर शोध आरम्भ कर दिया ।

src=http://theindusparent.com/wp content/uploads/2015/09/theIndusparent Education in India 1 9 15 CBSE.jpg भारत में school board कैसे चुनें ?

सीबीएसई

मुख्य भावना नए-नए पढ़ाई के तरीके तलाशने की है । सामान्य ज्ञान को बढ़ावा देना । इस बोर्ड में कई ऐसे विषय हैं जो बच्चे के अलग अलग विकास में मदद करते हैं । ज्यादातर जो मैथ और साइंस लेकर इंजीनियर या डॉक्टर बनना चाहते हैं वो सीबीएसई को तरजीह देते हैं ।

src=http://theindusparent.com/wp content/uploads/2015/09/theIndusparent Education in India 1 9 15 ICSE.jpg भारत में school board कैसे चुनें ?

आई.सी.एस.ई

इसमें प्रोजेक्ट्स पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है जो बच्चे के परफॉरमेंस को ध्यान में देते हुए दी जाती है । सीबीएसई के मुकाबले आई.सी.एस.ई का पाठ्यक्रम काफी विस्तृत और बड़ा है । विद्यार्थियों के चौतरफा विकास पर ध्यान दिया जाता है ।

सेकेंडरी स्कूल सर्टिफिकेट ( एसएससी )

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पाठ्यक्रम काफी कम और निर्धारित होते हैं । क्षेत्रीय भाषा पर जोर दिया जाता है । हालाँकि समय के साथ इसमें काफी बदलाव किये गए हैं ।

इंटरनेशनल बकलौरेट ( आई.बी)

src=http://theindusparent.com/wp content/uploads/2015/09/theIndusparent Education in India 1 9 15 IB.jpg भारत में school board कैसे चुनें ?

पढ़ाने की व्यवहारिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है । बच्चों के विकास के लिए कई उपयोग पर आधारित विषय भी होते हैं । इस बोर्ड का ज्यादा ध्यान बच्चे की जानकारी को बढ़ाने पर होता है उसकी यादाश्त और रफ़्तार पर नही । यह बाकि 3 बोर्ड के मुकाबले सबसे महंगी है ।

तो क्या कोई सही बोर्ड है पढ़ाई के लिए ?

src=http://hindi admin.theindusparent.com/wp content/uploads/sites/10/2015/12/mes indian school.jpg.jpg भारत में school board कैसे चुनें ?

शायद केवल बोर्ड केवल इकलौता फैक्टर नहीं है । इसके साथ साथ पढ़ाने की विधि, तकनीक का इस्तेमाल, माता पिता का सहयोग, बच्चे की पसंद और सिखने की क्षमता का ज्यादा रोल होता है । SICES हाई स्कूल, थाणे के प्रधानाध्यापक रेठि ए. नैर बताते हैं की हम सरकार द्वारा निर्धारित किये गए पाठ्यक्रम को ही पढ़ाते हैं । मुझे लगता है की केवल बोर्ड बच्चे का भविष्य तय नहीं करता है । माता पिता को पढ़ाई की गुणवत्ता पर भी ध्यान देना चाहिए । उन्हें बैठ कर अपने बच्चे के भविष्य पर चर्चा करनी चाहिए ।

एक और तथ्य जिसपर नैर रौशनी डालते हैं वो ये की सीबीएसई, आई.सी.एस.ई और आई.बी जैसे बोर्ड संपन्न परिवार के लोग ही चुन पाते हैं ।

" ये माता पिता खर्च उठा सकते हैं । उनके कोचिंग पर खर्च कर सकते हैं । लेकिन एसएससी बोर्ड में पढ़ने वाले बच्चे हो सकता है की संपन्न परिवार से ना हों । इनके माता पिता रोज के झंझट में इतने उलझे होते हैं की उन्हें अपने बच्चे के लिए आसानी से समय नहीं मिल पाता है ।" 

क्या एक बोर्ड का बनना इसका उपाय है ?

सही बोर्ड चुनने के सवाल को एक अनोखा मोड़ देने के लिए जरूरी है की हम पढ़ाई के स्तर को भारत में ऊँचा कैसे करें इसपर सवाल उठाएं ।

दिल्ली के संस्कृति विद्यालय पूर्व संस्थापक प्रधानाध्यापक गौरी ईश्वरन के अनुसार, "देश भर में एक समान बोर्ड, एक मूल्यांकन के प्रारूप और एक अंकन प्रणाली होनी चाहिए। मौजूदा सिस्टम कैट, आई.आई.टी-जे.ई.ई  तथा मेडिकल के छात्रों में बहुत भेदभाव पैदा कर रहा है। "

ईश्वरन बताते हैं की तामिलनाडु में ज्यादातर बच्चे कक्षा 10 तक सीबीएसई बोर्ड से पढ़ाई करते हैं और उसके बाद वो स्थानीय बोर्ड से पढ़ते हैं क्योंकि उसकी मार्किंग आसान है।  इससे उन्हें अच्छे यूनिवर्सिटी में दाखिला मिल जाता है।

इसके अलावा ईश्वरन बताते हैं की अलग-अलग बोर्ड में भेदभाव होने से एक नहीं कई नुकसान होते हैं।  गाँव के माता पिता के पास स्थानीय बोर्ड से पढ़ाने के अलावा कोई चारा नहीं बचता है।  तो क्या इसका मतलब ये हैं की बच्चे एक तय सीमा तक ही सपने देखें ? ईश्वरन आगे बताते हैं की 99.99 % बच्चों के लिए जो मेडिकल या इंजीनियरिंग आदि की कोचिंग लेते हैं,कोई भी बोर्ड मायने नहीं रखता।  ऐसे में पाठ्यक्रम का रोल ही खत्म हो जाता है।

जब तक ये बोर्ड और प्रवेश परीक्षाओं का एक दूसरे से ताल-मेल नहीं होगा तब तक ये कमियां रहेंगी ही।इसके लिए जरूरी है की एक बोर्ड की स्थापना की जाए जो नियमित रूप से सभी से ताल-मेल के साथ चले।

संध्या सबुलाल एक शिक्षक होने के साथ साथ 20 साल के बेटे की माँ भी हैं। संध्या बताती हैं की कौन से बोर्ड से आप पढ़ाई करते हैं उससे फर्क नहीं पड़ता। उनके बेटे से एसएससी बोर्ड से स्कूल में पढ़ाई की और साथ साथ बाहर से कोचिंग भी की।  इससे उसने मुंबई के एक बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लेने में सफलता पाई। वो याद करती हैं उन दिनों को जब उन्हें 7-8 स्कूलों के चक्कर लगाने पड़ते थे लेकिन उन्हें अपने बेटे की क्षमता पर पूर्ण विश्वास था।

शायद अजीत करकरे की बातें कई माता-पिता के मन की दुविधा को काम कर देंगी। गुरुकुल द डे स्कूल के संस्थापक और प्रधानध्यापक कल्याण बताते हैं की बच्चों को चुनने का एकमात्र तरीका विद्यालय के पढ़ाने की विधि को देखकर तय किया जाना चाहिए ना की बोर्ड से।

सभी बोर्ड के पाठ्यक्रम बच्चे के विकास के स्तर से बनते हैं।  इसीलिए 8वीं कक्षा तक सभी बोर्ड के पाठ्यक्रम लगभग एक जैसे ही होते हैं।  एक आदर्श विद्यालय को अपने बच्चों के लिए सीखने का माहौल बनाना चाहिए जो की बहुत ही काम विद्यालयों में होता है।

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