बच्चों को देना चाहती हैं टॉयलेट ट्रेनिंग..रुकिए और पहले यह पढ़ लीजिए

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पैरेंट्स हमेशा जो चाहते हैं जरूरी नहीं परिणाम भी उतना ही अनुकूल मिले। यहां हम आपको कुछ सलाह दे रहे हैं कि कैसे बच्चों को टॉयलेट जाने के लिए सिखाएं।

मम्मियां हमेशा याद रखें कि आपका बेबी असल में एक नया कौशल सीख रहा है। ये महत्वपूर्ण है कि आप अपने बेबी को सहज रखते हुए आगे बढ़ें।

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हालांकि ये काफी बोझिल प्रक्रिया है इसलिए कुंठित होने की जगह धैर्य रखें और बच्चे की मदद करें ।

नेशनल हेल्थ सर्विस (NHK), इंग्लैंड के अनुसार जब बच्चे शारीरिक रूप से तैयार होते हैं तब ब्लाडर और पॉटी कंट्रोल करना वो जानते हैं।

बच्चे एक साल के बाद अक्सर रात में पॉटी करना छोड़ देते हैं। वो हमेशा साफ और सूखे जगह पर रहना चाहते हैं जो टॉयलेट इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग के लिए किसी हथियार की तरह है।

 

बच्चों के हिसाब से टॉयलेट ट्रेनिंग

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healthychildren.org टॉयलेट ट्रेनिंग व्यस्कों में एडल्ट मास्टरिंग कौशल लाता है जो मैन्युअल ट्रांसमिशन के साथ होता है।

टॉयलेट ट्रेनिंग प्रक्रिया बच्चों को शारीरिक और संज्ञानात्मक कार्यों तालमेल बिठाना सिखाता है। बच्चों को अपने शरीर और इसके क्रियाओं के बारे में जानना चाहिए और साथ ही उचित प्रतिक्रिया के साथ उत्तेजनाओं को समझने आना चाहिए।

बच्चे को समझना चाहिए कि उन्हें क्या करना है।उन्हें स्मृति और एकाग्रता का इस्तेमाल करना चाहिए।इस प्रक्रिया के लिए केयर करने वाले को अच्छे से स्प्ष्टीकरण और निर्देश देना चाहिए।

 

क्या आपका बच्चा टॉयलेट ट्रेनिंग के लिए तैयार है?

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सफल शौचालय प्रशिक्षण में आपके बच्चे की शारीरिक और भावनात्मक तैयारी बेहद जरूरी है। शारीरिक रूप से बेबी तब तैयार होता है जब वह आंत, मूत्राशय और मांशपेशियों  नियंत्रण विकसित करता है। हालांकि यह 18 महीने की उम्र में अधिकांश बच्चों को होता है तो कुछ बच्चो को यह विकसित करने में अधिक समय लग सकता है

med.umich.edu के अनुसार 18 महीने से 30 महीने तक लड़कों के लिए टॉयलेट ट्रेनिंग की सही उम्र है तो वहीं लड़कियों के लिए 29 महीना माना जाता है और कुछ लड़कों में यह 31 महीने तक भी होता है।

12-13 महीने तक बच्चे अंदर में भारी-भारी सा महसूस करने लगते हैं। इस समय तक बच्चे टॉयलेट या पॉटी के बारे में बताने भी लगते हैं और यही उनमें जागरुकता लाएगी कि वो टॉयलेट के इस्तेमाल के बारे मे  सोचें।

बच्चे अपने व्यवहार में तत्परता दिखाते हैं । Michigan यूनिवर्सिटी और webmd.com के एक आर्टिकल के अनुसार माओं को बच्चों में कुछ लक्षणों तो पहचाना चाहिए ताकि पता चले कि आपका बच्चा अब इस कौशल के लिए बड़ा हो गया है।

 

बच्चों की शारीरिक और भावनात्मक इच्छा को समझें

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हो सकता है कि बच्चे अलग-अलग तरीकों से गंदे डायपर में असहजता दिखाएं; 2 साल तक वो अपने शरीर और खासकर मल त्याग करने वाले अंगो में भी दिलचस्पी दिखाएं।

इस समय तक आप बच्चों को उनके शरीर और उसके कार्यों को समझा सकते हैं। बच्चे इससे मलत्याग प्रक्रिया को समझेंगे। बच्चों के इन शारीरिक और भावनात्मक संकेतों को देखकर पॉटी ट्रेनिंग की शुरूआत करें।

  • जब वो एक खास निर्धारित समय पर पॉटी करने लगें।
  • क्या आपका बच्चा 2 घंटे या अधिक समय तक टॉयलेट नहीं जाता है तो यह संकेत है कि उनका ब्लाडर अधिक देर तक मूत्र को जमा करके रख सकते हैं।
  • चेहरे के भाव, घुरघुराने या स्कायट्स कर रहे हो तो अर्थ है कि वो टॉयलेट या पॉटी करना चाहते हैं।
  • आपका बेबी समझ सकता है कि वो टॉयलेट जाना चाहता है और आपको बता भी सकता है।
  • आपका बेबी बुनियादी कौशल हासिल कर चुका है कि वो पॉटी तक जाए, अपनी पैंट उतारे और पॉटी पर जाए।
  • आपका बेबी अब वह थोड़ी बहुत बातें करने लगेगा और अपनी जरूरतों को बता सकता है और टॉयलेटिंग प्रक्रिया को समझाने वाले वाले शब्दों को समझ सकता है
  • आपका बच्चा आपको बताने लगेगा कि डायपर गंदा है इसे बदल दिया जाए या डायपर की जगह अंडरवियर पहनाने भी बोल सकता है।
  • आपका बच्चा साधारण मौखिक निर्देशों का पालन करने लगे।
  • आपके छोटे बच्चे बड़े बच्चों या घर के बाकी सदस्यों की नकल कर सकते हैं।

 

यहां जाने कैसे आप पॉटी का इस्तेमाल करने में बच्चों की मदद कर सकते हैं

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  • अपने बच्चे को पॉटी का इस्तेमाल करने के लिए बढ़ावा दें। उन्हें पूरे कपड़ों में बैठाएं और इसे तबतक जारी रखें जब तक वो सहज ना हो जाए।

 

    • पॉटी में गंदे डायपर डालें ताकि यह दिखाया जा सके कि इसके लिए क्या प्रयोग किया जाता है।

 

  • दिन में कई बार बच्चे को पॉटी का नेतृत्व करें और डायपर के बिना पॉटी पर बैठने के लिए उसे प्रोत्साहित करें वो भी खासकर खाना खाने के बाद।

 

    • बैठेने के समय में निरतंता बनाए रखें और धीरे-धीरे समय को बढ़ाएं।

 

  • अगर आप चाहें तो पॉटी बुक या पॉटी सॉन्ग बना सकती हैं ताकि वो मस्ती करते हुए चीजों को समझ सकें।

 

पॉटी ट्रेनिंग के दौरान इन बातों का रखें ख्याल

हमेशा याद रखें कि बच्चे पर कभी दवाब ना डालें कि वो कम उम्र से प्रशिक्षित हो जाएं क्योंकि ऐसा करने पर वो और अधिक समय लेंगे। कभी भी इसे दोनों के लिए तनावपूर्ण समय ना बनने दें।

अपने बच्चे को इस दौरान स्वतंत्र रहने दे ताकि वो सक्रिय रूप से अपनी भागीदारी निभा सकें। हमेशा सिंपल, प्रैक्टिकल और सीधी भाषा का प्रयोग करें ना कि नकारात्मक भाषा का।

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सबसे आखिरी बात हर कदम पर अपने बच्चे का मनोबल बढ़ाएं।

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