बच्चे का कान कब छिदवाएं और छेदने की कौन सी विधि सबसे सही जानिए

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मैं अपने अनुभव के आधार पर ये ज़रुर कह सकती हूं कि 3-5 साल की उम्र के बीच ही बच्चियों की पीयर्सिंग करवानी चाहिए जितनी कम आयु में करवाएंगी उतना ही दर्द कम होगा ।          

कान छेदन को हमारे देश के विभिन्न हिस्सो में पारंपरिक रिवाज़ के तौर पर निभाया जाता है जिसका ताल्लुक हमारे इतिहास से भी रहा है । इसके पीछे एक मान्यता ये है कि कान छिदवाने वाले व्यक्ति पर नकारात्मक शक्तियां काम नहीं करती और इसतरह बुरी आत्माओं से रक्षा होती है ।

वैसे विज्ञान के मुताबिक कान छिदवाना एक्युपंचर थेरेपी का एक हिस्सा है जिसके कई फायदे होते हैं । जी हां, कान के बाहरी भाग में कई ऐसे बिंदू हैं जिसमें पीयर्सिंग करवाने से आपको चौकाने वाले फायदे मिल सकते हैं लेकिन सटीक रिजल्ट के लिए सही एक्युपंचर प्वांइट पता होनी चाहिए ।

कहीं–कहीं शिशु के नामकरण वाले दिन ही कान छिदवाया जाता है जबकि कई संस्कृतियों में मुंडन या जनेऊ संस्कार तक का इंतज़ार किया जाता है । देश के कई क्षेत्रों में लोगों ने अब इस पुरानी परंपरा को ना कह दिया है ,रिवाज़ की पूर्ति के लिए कई जगह अब मुंडन के दिन कान छेदने वाले को बुला कर बच्चे के कानों को स्पर्श करा दिया जाता है ।

हालांकि सौंदर्य बढ़ाने या आभूषण पहनने के लिए कान छिदवाने का चलन बरकरार है  ।  

किस उम्र में बच्चे का कान छिदवाएं

src=https://hindi admin.theindusparent.com/wp content/uploads/sites/10/2017/08/image001.jpg बच्चे का कान कब छिदवाएं और छेदने की कौन सी विधि सबसे सही जानिए

अगर आपके यहां कान छेदन की कोई रस्म नहीं होती या आपने इसे मानने से मना कर दिया हो तो इसमें कोई बुराई नहीं है । यूं तो ईअर पीयर्सिंग करवाने का समय तय करना आपकी  इच्छा पर निर्भर करता है लेकिन बच्चियों के कान छोटी उम्र में छिदवाना सही रहता है क्योंकि इस समय उनके कान कोमल और अपरिपक्व होते हैं जिन्हें आसानी से भेदा जा सकता है । इस समय मात्र सूई चुभने जैसा दर्द होगा ।

मुझे याद है कि कैसे मेरे पिता लड़कियों के कान छिदवाने के विरोधी थे वो नहीं चाहते थे कि मैं औरों की तरह कभी कनबाली पहनने के लिए बचपन में यह दर्द सहूं इसलिए उन्होंने अपनी नज़र के सामने कभी ऐसा होने नहीं दिया । जब मैं करीब 10 वर्ष की रही होउंगी तब पिताजी की अनुपस्थिति में मेरी बुआ ने मुझे ठंढ़ के मौसम में अपने गांव बुलवाकर मेरे कान छिदवाये । मैं भी आसानी से मान गई थी क्योंकि मुझे भी बांकि लड़कियों की तरह ईअररिंग्स पहनने का शौक था ओह ! कितना दर्द हुआ था तब ।

जैसे ही मेरी चीख निकली बुआ ने मेरे मुंह में गुड़ डाल दिया , हां ये रिवाज़ का ही एक हिस्सा था और घर आकर कान छेदने वाले सोनार को कुछ पैसे और अनाज भी देने की प्रथा पूरी की गई । उस सोनार ने मुझसे कहा कि हर सुबह पत्तों पर पड़ी ओस की बूंदें अपने कान पर लगाना इससे जख्म जल्दी भर जाएंगे ।मुझे नहीं पता आपको अपने कान छिदवाने का अनुभव याद भी है या नहीं लेकिन चुकि उस वक्त मैं बड़ी हो गई थी इसलिए मुझे आज भी सब याद है ।

मैं अपने अनुभव के आधार पर ये ज़रुर कह सकती हूं कि 3-5 साल की उम्र के बीच ही बच्चियों की पीयर्सिंग करवानी चाहिए जितनी कम आयु में करवाएंगी उतना ही दर्द कम होगा ।                                                                                                                                                          

कहां और किससे कान छिदवाएं

अधिकांशत: घरेलू सोनार के यहां जाकर कान छिदवाया जाता है जिनके पास सोने की तार से या फिर गन शॉट लगाकर कर्ण भेदन किए जाते हैं। जगह चाहे जो भी चुनाव करें पर ये ध्यान रखें कि कान छेदने वाला अनुभवी हो और उसके उपकरण हाईजिनिक हों ।

आपको बता दें कि शिशुओं के क्लीनिक में भी कई जगह कान छेदने की व्यवस्था रहती है जहां आप प्रशिक्षित व्यक्ति से स्वच्छ माहौल में बच्चे का कान छिदवा सकती हैं ।

पहनाने के लिए कैसी बाली या बूंदा चुनें   

छोटे आकार की गोल सोने की बाली सही रहेगी । इसे घुमाकर छेद साफ रखा जा सकता है और उसमें हवा भी लग सकेगी । ये ज्यादा बड़ी ना हो कि कुछ फंसने या खींचे चले जाने का डर रहे ।

पुराने समय से ही नीम की सींक छेद में डालने की सलाह दी जाती है क्योंकि ये रोगाणु रहित होते हैं । टॉप्स जैसा बूंदा पहली बार पहनाने के लिए बिल्कुल भी सही नहीं होगा क्योंकि इसे पिछले हिस्से से दबाया जाता है जिसके कारण घाव हो सकता है ।  

इस अलावा बच्चे के कान छिदवाने के दौरान आप उसे आरामदेह कपड़े पहनाए जिसे उतारना आसान हो ।अगर बच्चा बहुत छोटा है तो आप उसके सिर को एक पोजिशन में रख कर कान छिदवाएं । साथ ही उसका दिमाग दर्द से हटा कर दूसरी ओर करने के लिए आप उसके पसंदीदा खिलौने या खाने की चीज भी अपने साथ लेकर जाएं । डॉक्टर की सलाह से एंटीसेप्टिक भी आपको ले ही लेनी चाहिए ।