नवजात शिशु में जॉन्डिस (पीलिया) के लक्षणों की पहचान एवं बचाव के सरल उपाय जानने के लिए पढ़ें

अगर जन्म के समय से लेकर एक माह तक की आयु वाले शिशु की आंखों में और उसकी त्वचा पर पीलापन दिखाई दे तो इसे नवजात पीलिया कहते हैं ।

आमतौर पर हम शिशु को जॉन्डिस होने का नाम सुनते ही घबरा जाते हैं और बड़ों में होने वाले पीलिया रोग की तरह ही इसे समझने की भूल कर बैठते हैं । जबकि शिशुओं में पीलिया होना लीवर से संबंधित नहीं होता ।

दरअसल ये ब्लड में पिग्मेंट या बिलीरुबीन की मात्रा बढ़ने के कारण होता है जिसके कारण शिशु के शरीर में उपस्थित रक्त की लाल कोशिकाएं खराब होती जाती हैं और त्वचा में पीलापन प्रत्यक्ष रुप से देखा जा सकता है ।

अगर जन्म के समय से लेकर एक माह तक की आयु वाले शिशु की आंखों में और उसकी त्वचा पर पीलापन दिखाई दे तो इसे नवजात पीलिया कहते हैं ।

शिशु में जॉन्डिस

फुल टर्म गर्भावस्था के बाद जन्म लेने वाले तकरीबन 60 फीसदी शिशुओं में ये समस्या देखी जा सकती है जबकि प्री मैच्योर अवस्था में जन्म लेने वाले 80 फीसदी शिशुओं में जन्म के चार-पांच दिनों बाद पीलिया के लक्षण दिखाई देते हैं ।

अमूमन ये रोग एक से दो हफ्ते में पूरी तरह ठीक हो जाता है लेकिन अगर शिशु के शरीर में बिलीरुबीन की मात्रा अधिक बढ़ जाती है तो उसका नाज़ुक शरीर इसे सहन नहीं कर पाता ।

ख़ासकर प्री मैच्योर बेबी के मामले में ज्यादा सावधानी बर्तनी चाहिए । पीलिया के प्रभाव से शिशु स्थिर हो सकता है, वो पेशाब करना कम कर देगा या बिल्कुल भी नहीं करेगा, पीला पेशाब करेगा, दूध पीने की इच्छा नहीं होगी । ऐसे समय में उसे अधिक से अधिक मां का दूध पिलाना चाहिए ताकि शरीर में पानी की कमी ना हो ।

जॉन्डिस के लक्षण कैसे पता करें...

ऐसा भी हो सकता है कि जन्म के वक्त शिशु स्वस्थ हो लेकिन 2 से 3 दिनों के बाद उसका शरीर पीला पड़ने लगे । इसलिए मां को निरंतर ही शिशु के मल, मूत्र या शिशु की आंखों की जांच करते रहना चाहिए ।

शिशु को जॉन्डिस है या नहीं इसका पता लगाने के लिए आप शिशु के पेट पर फिंगर टिप से दबाएं, इसके बाद अगर पीला निशान स्पष्ट हो रहा हो तो ये शिशु के शरीर में बिलीरुबीन नाम के रसायन की मात्रा बढने का संकेत है ।

जानिए क्यों आपको चिंता नहीं करनी चाहिए...  

चूंकि मैंने खुद अपने शिशु को जॉन्डिस से ऊबरते देखा है इसलिए आपसे भी यही कहना चाहुंगी कि ऐसी परिस्थिति में हिम्मत से काम लेना चाहिए। यह बीमारी आजकल बेहद आम हो चुकी है जिसका इलाज आसानी से हो सकता है ।

यदि शिशु कोई दुलर्भ विषम परिस्थिति में ना हो तो सामान्य पीलिया रोग शिशु को विशेष हानि नहीं पहुंचाता ।

फिर भी शिशु में पीलिया से संबंधित कोई भी लक्षण नज़र आए तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए । शुरुआती अवस्था में पीलिया के रोकथाम के लिए डॉक्टर शिशु को नग्न अवस्था में हर सुबह उगते सूर्य की किरणों में रखने के लिए कहते हैं और शाम ढ़लने से पूर्व भी शिशु को हल्की धूप में रखने की सलाह देते हैं । लाल रक्त कोशिकाएं के अधिक मात्रा में खराब होने की अवस्था में शिशु विशेषज्ञ फोटोथेरेपी की सलाह देते हैं ।

जी हां, ये एक ऐसी तकनीक है जिसके माध्यम से शिशु के बॉडी में उपस्थित बिलीरुबिन की मात्रा को घटाया जाता है । इस प्रक्रिया में आवश्यकतानुसार एक दो दिन के लिए शिशु के आंखों को ढ़क कर उसे तीव्र प्रकाश की किरणों के बीच रखा जाता है ।

अतिरिक्त पीला पित्त वर्णक (ब्लीरुबिन) के शरीर से निकलते ही शिशु पूर्ण रुप से स्वस्थ हो जाता है ।