आपका दो साल का बच्चा नर्सरी के लिए देगा इंटरव्यू

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ज्यादातर स्कूल जो इंटरव्यू लेते हैं वो ज्यादातर पैरेंट्स के जॉब, पढ़ाई, इनकम को देखते हैं

अगर आप इस गलतफहमी के शिकार हैं कि प्ले स्कूल  के बाद अच्छे स्कूल में एडमिशन लेना कोई बच्चों का खेल हैं तो रुकिए इस बारे में एक बार और सोचिए। आपको हैरानी होगी कि ये सच्चाई है कि ये किसी युद्ध से कम नहीं है।

आपको अपने बच्चे के उस दिन से इसकी तैयारी शुरू करनी होगी जब से वो चलना सीख लेते हैं।आजकल तो बच्चों को इसके लिए कोचिंग भी देने लगे हैं। अब आप पूछेंगे क्यों? तो आपको बता दें कि कुछ स्कूल अब इसका पालन करने लगे हैं कि वो बच्चों और पैरेंट्स को पहले ही जांच परख लें। Huffington Post के एक लेख के अनुसार हर कोई चाहता है कि उनका बच्चा सबसे अच्छे स्कूल में पढ़े।

मुंबई के पैरेंट्स लाखों रूपए खर्च करते हैं ताकि बच्चों को अच्छे स्कूल में एडमिशन मिल जाए। हैरत की बात तो ये है कि तीन साल के बाद बच्चों को स्कूल भेजना खराब परवरिश की निशानी मानी जाती है क्योंकि उनका मानना है कि वो सीखने की उम्र पार कर चुके हैं।

हर किसी की यही कहानी

बच्चों को अच्छे स्कूल में जाने के लिए कोचिंग सिर्फ मुंबई नहीं बल्कि अधिकतर राज्य का राजधानी में होता है। हमने admissionnursery.com जो नर्सरी स्कूल के एडमिशन की सबसे बड़ी कम्युनिटी है उसके फाउंडर सुमित वोहरा से बात करने की कोशिश की और उन्होंने काफी चौंकाने तथ्य बताए।

सुमित वोहरा के अनुसार "दिल्ली में स्कूलों में एडमिशन लेना गैर कानूनी है लेकिन फिर भी कुछ स्कूल छिप छिपाकर ऐसा करते हैं । ज्यादातर स्कूल जो इंटरव्यू लेते हैं वो ज्यादातर पैरेंट्स के जॉब , पढ़ाई, इनकम को देखते हैं और कहीं कहीं तो उनके फोन का कौन सा सेट है यहां तक पूछते हैं।

 स्कूल पैरेंट्स द्वारा दिए गए जानकारियों को पैन कार्ड के नंबर से मिलाते भी हैं।"उन्होंने कहा कि "गुड़गांव, नोएडा, गाजियाबाद और फरीदाबाद के कई स्कूलों में इंटरव्यू पैरेंट्स और बच्चों दोनों का लिया जाता है। "

पैरेंट्स पर दवाब
वोहरा का कहना है कि "ऐसे इंटरव्यू बच्चों के लिए प्रेशर नहीं बल्कि पैरेंट्स के लिए ज्यादा तनाव लाती है।पैरेंट्स इसके लिए काफी टेंशन में आ जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि क्या पता तीन साल के बच्चे का मूड खराब हो जाए और वो इंटरव्यू में अच्छे से परफॉर्म ना कर पाए। कई बच्चे इस दौरान डर भी जाते हैं क्योंकि उन्हें पैरेंट्स घर में तैयारी करवाते हैं और वो इतनी कम  उम्र में प्रेशर में आ जाते हैं। "
मि.वोहरा का मानना है कि "प्ले स्कूल में भी बच्चों को तैयार किया जाता है लेकिन फिर भी कुछ पैरेंट्स स्पेशल कोचिंग करवाते हैं लेकिन मेरा मानना है कि ऐसे कोचिंग से दूर होना चाहिए । प्ले स्कूल की कराई गई तैयारियां ही स्कूल के लिए काफी होती हैं।"

इंटरव्यू में पूछे जाने वाले सवाल

सुमित वोहरा ने हमे बताया कि "बच्चों से ज्यादातर कलर के बारे में पूछा जाता है या खिलौने, सब्जियों के बारे में पूछा जाता है।वो बच्चों से उनकी फेवरिट कविता, तीन शब्दों के अक्षर या Puzzleसॉल्व कर पाते हैं या नहीं इसपर ध्यान देते हैं।

उनको कोई मेडिकल समस्या नहीं हो , वॉशरुम जाने की ट्रेनिंग है या नहीं और यहां तक कि पैरेंट्स कौन सी कार रखते हैं इसपर भी नजर रखते हैं।" ऐसे इंटरव्यू में ज्यादातर बच्चों से ज्यादा प्रेशर और तनाव पैरेंट्स को होता है।

ऐसे इंटरव्यू का मनोवैज्ञानिक प्रभाव

" ऐसा लगता है कि पैरेंट्स रेस में शामिल हो गए हैं कि कौन कितने अच्छे स्कूल में पढ़ सकता है। किसी भी पैरेंट के लिए सबसे बुरी बात है कि वो 2-3 साल के बच्चों इसके लिए परेशान करते हैं या यूं कहें ट्रेनिंग में जुट जाते हैं जो करने की उनकी उम्र नहीं है।" कभी कभी तो पैरेंट्स तनाव के कारण अपने बच्चों पर गुस्सा करते हैं।

मनोवैज्ञानिक सीमा हिंगोरैनी का कहना है कि "मैं बच्चों का आईक्यू लेवल टेस्ट कर सकती हूं लेकिन कम से कम उसकी उम्र 8-10 साल होनी चाहिए। इतने छोटे उम्र में आईक्यू टेस्ट करने से बच्चा कितना इंटेलीजेंट इसका पता नहीं चल सकता।"

उनका कहना है कि बच्चे कितने इंटेलीजेंट हैं इसका पता उनके इमोशनल और साइकलॉजिकल साइड को समझ के किया जा सकता है। कई बच्चे इस कारण से आजकल डिप्रेशन में जा रहें और 10 साल की उम्र में इसकी दवाई ले रहे हैं। सबसे ज्यादा मायने स्कूल नहीं बल्कि आपका बच्चा इमोशनली और हर तरीके से कैसे बड़ा हो रहा है ये रखता है।

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Source: theindusparent