"मैं नजर के काले टीके में विश्वास नहीं करती थी पर एक दिन ..."

कहा जाता है कि कभी कभी परिस्थिति ऐसी हो जाती है कि आप विश्वास करने लगते हैं और ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ

मां बनने के बाद काफी कुछ बदल जाता है। कई बार जो चीजें आप सोच भी नहीं सकती आप उसमें भी यकीन करने लगती हैं। मैं आपके सामने आज एक टिपिकल भारतीय महिला हूं जो आधुनिक भी है और ट्रेडिशनल भी, जो भगवान में भी विश्वास करती है लेकिन रुढिवादी नहीं है, जो अपने बड़ों और सास-ससुर का आदर भी करती है लेकिन साथ ही अपनी गरिमा भी बनाकर रखती है।

मैं ये नहीं कहती कि किसी नियम या  परंपरा की अवहेलना करती हूं लेकिन अगर किसी चीज को विज्ञान ने माना है तो खासकर मैं उसमें विश्वास करती हूं। मां बनने के बाद भी मैंने उन्हीं सलाहों को माना जिसमें मेरा विश्वास हो लेकिन अंधविश्वासी मैं कभी नहीं बनीं।

मैंने बेबी के होने के 40वें दिन नहीं नहाने और बाल ना धोनी जैसे नियमों को नहीं माना। बेबी का मसाज मैं खुद किया करती थी क्योंकि मैनें कहीं पढ़ा था कि इससे मां और बेबी के बीच बॉन्डिंग अच्छी होती है।

काला टीका लगाकर बुरी नजर से बचाना

किसी ट्रेडिशन को निभाने में ज्यादा विश्वास नहीं करती इसलिए मैंने अपनी सास, मां या किसी को भी अपने बेबी के सर पर काला टीका कभी लगाने नहीं दिया।
सबसे पहले मेरा ये मानना था कि कोई इतना बुरा क्यों होगा कि छोटा सा बच्चा बीमार पड़ जाए, और मैं चारकोल से बना काजल बच्चे के सेंसिटिव स्कीन पर क्यों लगाऊं?

यहां तक की मेरी मां हमेशा मुझे काला टीका लगाने की सलाह देती थीं और बेबी को नजर लगने से बचाने भी बोलती थी, खासकर जब वो रोती थी लेकिन सब बोलते रहे और मैंने ऐसी सलाहों को कभी नहीं माना।

लेकिन कहा जाता है कि कभी कभी परिस्थिति ऐसी हो जाती है कि आप विश्वास करने लगते हैं और ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ।  मैं विदेश (शंघाई) में अपने दोस्तों और फैमिली से दूर थी। जो लोग कभी विदेश में नहीं रहे हैं उन्हें मैं बताना चाहती हूं कि देश के बाहर रहना और बेबी को संभालना काफी मुश्किल होता है और इसका सबसे बड़ा कारण होता है कि वहां आपकी मदद करने वाला कोई नहीं होता।

कहने की जरूरत नहीं है कि कई बार मैं खुद को बेबस महसूस करती थी खासकर जब 9 महीने का बेबी बीमार पड़ जाए। सितंबर 2012 में हम लगभग चार दिन बाद भारत लौटने वाले थे और अचानक मेरी बेटी को उल्टियां शुरू हो गई। हम उसे लेकर हॉस्पिटल पहुंचे लेकिन डॉक्टर ने कहा कि सबकुछ ठीक है।

उसकी उल्टियां ठीक नहीं हो रही थी...

हॉस्पिटल से आने के एक घंटे के बाद ही उसने उल्टियां फिर से शुरू कर दी लेकिन रात इतनी हो चुकी थी कि हॉस्पिटल ले जाना संभव नहीं था। आपको बता दें कि चाइना में डॉक्टर्स बच्चों को तुरंत दवाइयां नहीं देते। पहले वो बल्ड टेस्ट करते हैं और जरूरत हो तभी दवाई देते हैं।

 अगले दिन बल्ड टेस्ट की रिर्पोट भी ठीक आई और डॉक्टर ने मुझे एक दिन और ऑव्जरवेशन में रखने को कहा। उन्होंने मुझे इलेक्ट्रॉल देने के लिए कहा था और दवाईयों के लिए सख्ती के साथ मना किया था लेकिन ना मैं उन्हें समझ पाई और मैं जो बोलना चाह रही थी वो भी नहीं समझ पाए।
 
ये पहली बार था जब मैं लाचार महसूस कर रही थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करुं। अगले ही दिन हमारी फ्लाइट थी। अचानक मुझे लगा कि मुझे अपनी बेटी को ठीक करने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए।

मैं लगातार बहुत कुछ सोचे जा रही थी और पता नहीं क्या ख्याल आया कि मैं कुछ मिर्च और एक चुटकी नमक लेकर सात बार बेबी के चारों और घुमाया और उसे जला दिया। मुझे नहीं पता था कि मैं क्या कर रही थी, उस समय कोई पढ़ी लिखी कामकाजी महिला नहीं थी जो हर चीज के पीछे तर्क और तथ्य देखती थी। मैं बस एक मजबूर मां थी जो अपनी बेटी को ठीक करने के लिए कुछ भी कर सकती थी।

इसके बाद जो हुआ वो चौंकाने वाला था, मेरी बेटी अगले दिन सोकर उठी और उसकी उल्टियां भी रात भर में ठीक हो चुकी थी । मुझे नहीं पता की नजर वाली चीज काम की या वो खुद ठीक हो गई लेकिन इसके बाद मैं काला टीका रोज उसके सर पर लगाने लगी। मैं कोई चांस नहीं लेना चाहती थी। क्या आपने भी कभी ऐसा किया है?

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Source: theindusparent