क्यों मैं अपनी बेटी को छोटा भीम या और कोई कार्टून नहीं देखने देती...

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उसका कोमल दिमाग उन सब चीजों पर विश्वास कर रहा था जो असलियत में है ही नहीं।

इस महीने मैंने अपने घर में केबल कनेक्शन काटने का फैसला लिया और टीवी को अपने परिवार से कुछ दिनों के लिए दूर कर दिया। मैं पिछले कुछ महीनों से देख रही थी कि मेरी बेटी की दिलचस्पी लगातार टीवी में बढ़ती ही जा रही थी। इतना की खाना भी वो तब तक नहीं खाती थी जबतक कि टीवी ऑन ना हो जाए।

मैंने यहां तक तक गौर किया कि वो टीवी शो में इस तरह रम जाती थी कि अगर उसे टॉयलेट जाना हो तो वो भी तबतक कंट्रोल कर लेती थी जबतक कि ब्रेक ना आ जाए और एक मां के तौर पर मैं ये सब देखकर काफी चिंतित थी।

एक और चीज जो मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी वो ये कि अब वो कार्टून देखने के लिए वो पार्क में खेलने भी नहीं जाना चाहती थी। पता नहीं कब उसे छोटा भीम देखने का चस्का लगा और उसे देख देखकर मेरी बेटी को भी छोटा भीम की तरह स्ट्रॉन्ग बनने के लिए लड्डू चाहिए होते थे। जब मैंने उसे समझाने की कोशिश की कि लड्डू से कोई स्ट्रॉन्ग नहीं बनता तो उसे मेरी बात का विश्वास नहीं हुआ क्योंकि “छोटा भीम कहता था कि लड्डू स्ट्रॉन्ग बनाते हैं”।

इसके अलावा आजकल के शो की भाषा की तो बात ना ही की जाए तो बेहतर होगा। मेरी बेटी ऐ लड़की, बद्तमीज़, बेवकूफ जैसे शब्दों को अपनाने लगी जबकि ऐसे शब्द घर में कोई प्रयोग तक नहीं करता था।

कहने की जरुरत नहीं है कि इन सब से मेरी चार साल की प्रभावित हो रही थी और वो इन फिक्शनल शो पर आखें बंद कर भरोसा करती थी। उसका कोमल दिमाग उन सब चीजों पर विश्वास कर रहा था जो असलियत में है ही नहीं।

आखिरकार मैंने फैसला लिया कि अब कोई ठोस कदम उठाना जरुरी है और मैंने सोच लिया था कि अपनी बेटी को इन काल्पनिक दुनिया के अजीबोगरीब कैरेक्टर से प्रभावित होने नहीं दूंगी और आज मैं ये कह सकती हूं कि मैंने बिल्कुल सही फैसला लिया था।

शुरूआत के कुछ सप्ताह...

src=http://www.theindusparent.com/wp content/uploads/2016/05/GIRL.jpg क्यों मैं अपनी बेटी को छोटा भीम या और कोई कार्टून नहीं देखने देती...

केबल कटवाने के बाद शुरूआती कुछ सप्ताह तो भयावह थे। डे केयर से लाने के बाद वो कार्टून देखने की जिद करती थी और रोती थी। उसे समझाना मुश्किल था कि कार्टून की जगह कोई और काम करे। धीरे धीरे वो भी कार्टून को भूलने लगी।

मैंने उसे अलग अलग एक्टिविटी मैं व्यस्त करना शुरू किया जो उसे पसंद है जैसे उसे किताबें पढ़ना और खिलौनों से खेलना पसंद है या फिर मेरे साथ किचन में, लीविंग रुम में बैठकर बातें करना ।

ये सब खुद ब खुद शुरू नहीं हुआ। मैंने पहले अपनी रोज की चीजें उसके साथ शेयर करने लगी और धीरे धीरे मैं उसकी दुनिया को समझने लगी। दुनिया जिसके बारे में वो सोचती समझती थी और मेरे लिए बिल्कुल अनजाना था।

वो मुझे अपने दोस्तों के बारे में बताने लगी कि कैसे उसे एक दोस्त बहुत अच्छा लगने लगा। उसके बारे में वो काफी देर तक बातें करती थी। वो अपने टीचर्स के बारे में बताती है कि कौन से टीचर क्यों अच्छे लगते हैं और क्यों नहीं। उसे क्यों मेरा डे केयर से देर से उसे लाना अच्छा नहीं लगता।

उसके Invisible Pets…

मेरे साथ अक्सर अपनी कहानियां शेयर करने लगी कि उसे लीडर ऑफ द डे बनना पसंद है। वो डे केयर में छोटे छोटे बच्चों की देखभाल करती है क्योंकि वो बहुत छोटे हैं और उसे अच्छा लगता है। उसके कुछ Invisible Pets है और ये सीक्रेट सिर्फ उसकी मम्मी जानती है।

उसकी ये बातें जानकर मैं सोच में पड़ गई कि उसके दिमाग में कितना कुछ चल रहा होता है। वो कितनी एक्सप्रेसिव है जिससे मैं आजतक सिर्फ टीवी की वजह से अनजान थी।

हमलोग डाइनिंग टेबल पर अधिक समय बिताने लगे और मुझे पता चला कि उसे पी-नट बटर, दलिया, भिंडी, छोले, राजमा ये सब खाना पसंद है। हमलोग एक दूसरे से फैमिली के तौर पर ज्यादा क्लोज आने लगे।इतनी सारी बातों के बाद भी किताबें पढ़ने या आई पैड पर पार्टनर गेम खेलना, बेड पर यूं ही लेटे लेटे गप्पे करने का समय मिल जाता था।

टीवी समय बरबाद करता है

धीरे धीरे मेरी बेटी पहले से ज्यादा खुश रहने लगी और ज्यादा बातें भी करने लगी। इस पूरे घटनाक्रम से एक बात जो निकलकर आई वो ये कि टीवी समय बरबाद करता है। हमलोगों को नहीं पता था कि कितना समय हम यूं ही बरबाद कर रहे।

इन सबके बीच मैं अपनी बेटी को यू ट्यूब पर पीप्पा पिग और एनिमेटेड फिल्में और शो देखने देती हूं। मैं तो ये केबल कॉन्ट्रेक्ट वापस शुरू करने से रही और मेरी सलाह मानिए आप भी मत कीजिए।

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Source: theindusparent