क्यों मैंने समाज की परवाह करना छोड़ दिया है

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बार बार चोट पहुंचने के बाद भी कोई जरूरी नहीं है कि हमेशा समाज को मैं खुश करने की कोशिश करूं। सबसे जरूरी है कि हम खुद को खुश रखें।

एक मध्यमवर्गीय भारतीय परिवार से होने के नाते मुझे सिखाया गया था कि रिश्तों को निभाना और अपने आस पास को लोगों को खुश रखना जरूरी है।

ईमानदारी से कहूं तो मैंने अपनी जिंदगी में ज्यादातर समय यही किया।

मैं अब 36 साल की हूं लेकिन फिर भी मैं ये नहीं कहूंगी लोगों को हैंडल करने के मामले में परिपक्व हूं। मैंने कई जरूरी बातें सिखी हैं। और इन सब में सबसे जरूरी ज्ञान जो मैंने सीखा है कि बार बार चोट पहुंचने के बाद भी कोई जरूरी नहीं है कि हमेशा समाज को मैं खुश करने की कोशिश करूं। सबसे जरूरी है कि हम खुद को खुश रखें।

ये मत सोचिएगा मैं स्वार्थी हूं। मेरे पास कई ऐसी घटनाएं का प्रमाण है कि जो मैं बोल रही हूं उसका अर्थ सही मायनो में निकलता है।  

एक घटना का जिक्र मैं उदाहरण के रूप में करना चाहुंगी। जब मैं अपने रिश्तेदारों के यहां जाती थी तो वो अपने बच्चों को मुझे संभालने कहती थी और खुद बैठ कर टीवी देखा करती थी। मेरी मां काफी विनम्र महिला हैं और मुझे कभी ऐसा करने से मना नहीं करती थी।

बल्कि वो कहती थी कि इससे मॉम को मदद मिलेगी और उन्हें ब्रेक भी मिलेगा। लेकिन इसके बदले मेरी छुट्टियां बच्चों का ध्यान रखने में बरबाद होती थी जो मेरे साथ खेलते भी नहीं थे। ये गलत था।

हमेशा दूसरों के लिए क्लास नोट्स कॉपी करना

दूसरी घटना, मुझे याद है कि मैं स्कूल में ऊंची कक्षा में थी और मेरी एक दोस्त थी जो हमेशा नोट्स मुझे कॉपी करने बोलती थी। उसकी मां अक्सर उससे किचन में मदद लेती थी और अपने नोट्स मिस कर देती थी।

एक अच्छी दोस्त की तरह मैंने कभी मना नहीं किया और हमेशा मदद की जबकि इससे काम दुगना हो जाता था।ये भी गलत था।

टिपिकल चलता है एटिट्यूड रखने ऑफिस अंकल की मदद करना..

जब मैं ऑफिस ज्वाइन की थी वहां एक टिपिकल अंकल थे जो मुझसे अपनी काम में मदद लेते थे जबकि उनका काम मेरे प्रोफाइल में नहीं आता था।

वो अंकल घंटो घंटे फोन पर बातें करते थे, अपनी पत्नी से बात और भी बाकियों से बात। और मैं उनकी मदद कर रही थी।

एक भारतीय बहु के तौर पर अपने सपने और लक्ष्य को छोड़ देना..

जैसे जैसे मैं बड़ी हुई मुझे जिससे प्यार हुआ उसकी डिमांड अपने परिवार को लेकर बढ़ते गई। एक टिपिकल भारतीय लड़की और महिला धीरे धीरे भारतीय पत्नी और बहु बन गई और हर बात को मानते गई चाहे वो करियर को छोड़ना हो। मैंने सबकुछ छोड़कर दिया किचन में रोटी सब्जी बनाने लगी।

 
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चाहे वो मेरी कंफर्टेबल जींस टॉप या अच्छी ड्रेसिंग हो । मैने सबकुछ छोड़ दिया। बिना किसी को जाने कि वो कौन है मैं पैर छूती थी। मेरा सोशल सर्किल छूट चुका था जिसमें कई लड़के भी शामिल थे। मैंने पार्टी करना छोड़ दिया क्योंकि ये भारतीय महिला पर बिल्कुल भी शोभा नहीं देता है कि अंधेरा होने के बाद वो बाहर निकलें..और ये कभी ना खत्म होने वाली लिस्ट है।

मां बनने के बाद भी मैंने दूसरों को खुश रखने के लिए कई बार कई चीजें की जैसे बेबी की आखों में काजल लगाना हो, वो जेवर पहनना जो मुझे नहीं अच्छा लगता था , लोगों से भरे कमरे में स्तनपान कराना हो और बाकी मुझे देखते रहें, सी-सेक्शन के बाद भी बेड जल्दी छोड़ देना क्योंकि मुझे बहु होने का कर्तव्य निभाना था।  

मैंने ये सब किया लेकिन पलटकर कभी जवाब नहीं दिया या किसी को कड़वे बोल नहीं बोली। लेकिन शायद ये मेरी गलती थी कि मैं हमेशा अच्छी और लोगों को खुश रखने की कोशिश करती रही। ना जाने मैंने अपनी इस सोच को तब क्यों नहीं बंद कर दिया।  

अब मैं 36 साल की हो गई हूं और अपने मन की बात सुनती हूं। बदलाव भी मुझे खुद दिख रहा है कि आस पास के लोग मुझसे ज्यादा नहीं उलझते हैं। जाहिर है हमारा भारतीय समाज महिलाओं के व्यवहार को लेकर पक्षपाती रहा है। मुझ गर्व है कि मैं दो बिल्कुल कॉन्फिडेंट और जागरूक बेटियों को बड़ा कर रही हूं जिन्हें अच्छा इंसान होने और महत्व नहीं समझ जाने में अंतर पता है।

क्या आपने भी कभी ऐसे पलों को जिया है जब आप दूसरों के लिए अच्छी बनकर रही लेकिन आप खुद के साथ गलत कर रही थीं। क्या आप भी अपनी बेटियों को मजबूत और आत्मनिर्भर बना रही हैं। हमारे साथ शेयर जरूर करिएगा।

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Source: theindusparent