क्या मेरी नज़र लगने से मेरी बेटी बीमार पड़ी ?

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"दीदी, परसों बाल कटा के लाये थे ना बेबी के, तो आप कितना बोल रहे थे कितनी क्यूट लगे रही है, नव्या। आपकी ही नज़र लग गयी उसे और बीमार पड़ गयी।"

सुबह-सुबह जब मैंने अपने बेटी के सर पर हाथ फेरा, तो माथा तपतपा रहा था। मैं उछल पडी। तीन दिन की छुट्टी के बाद आज मंडे था और मेरी पाँच साल की बेटी बीमार हो गयी।

सबसे पहले थर्मामीटर से उसका बुखार नापा। बाप रे १०३ डिग्री। ऑफिस whatsapp ग्रुप में तुरंत मैसेज डाला की आज नहीं आ पाऊंगी बेटी बीमार है। सोचा दूध बिस्कुट देने के बाद दवाई दे दूंगी। ऐसा करने के लिए उठी ही थी की कामवाली आ गयी।

क्या सच में माँ की बुरी नज़र बच्चे को लगती है?

"दीदी, परसों बाल कटा के लाये थे ना बेबी के, तो आप कितना बोल रहे थे कितनी क्यूट लगे रही है, नव्या। आपकी ही नज़र लग गयी उसे और बीमार पड़  गयी।"

मैंने तुरंत उसे डाँट दिया और कहा हट ऐसा भी कहीं होता है, मैं तो उसकी माँ हूँ, मैं उसका बुरा क्यों चाहूंगी. कभी माँ की भी नज़र बच्चे को लगती है?

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"नहीं दीदी हमारे यहां कहते हैं की सबसे पहले माँ की बुरी नज़र ही बच्चे को लगती है। हम इसे माँ की मीठी नज़र भी कहते हैं। आप बेबी की इतनी तारीफ ना किया करो वह बीमार पड़ जाती है ।"

मुझे बहुत गुस्सा चढ़ा और मैंने उसे बोलै "अपने काम से काम रखा कर मंजू। फालतू की बातें मुझसे मत किया कर।"

वह काम करने में बिजी हो गयी और मैं सोचने लगी हो सकता है इसके यहां ऐसा कहते होंगे। मैंने तुरंत फ़ोन उठाया और डॉक्टर का अपॉइंटमेंट ले लिया ।

नज़र  का  काला  धागा ...

शाम को डॉक्टर के यहां से लौट रही थी तो एक सहेली रास्ते में मिल गयी। उसने तुरंत पुछा की नव्या इतनी डाउन क्यों लग रही है। बताया तो वह बोली, तू पिछले हफ्ते बोल रही थी ना की आजकल नव्या हेल्थी लग रही है बीच में पतली हो गयी थी तेरी नज़र लग गयी।"

मेरा मुँह खुला का खुला रह गया। अब तो हद ही हो गयी थी। कामवाली का तो ठीक है वह बेचारी अनपढ़ उसे क्या पता लेकिन पढी लिखी हो कर भी मेरे सहेली इन बातों में विश्वास रखती हैं? मुझे अच्छा नहीं लगा और मैं तपाक से बोली।

"पूजा, तुझसे ये उम्मीद नहीं थी। पढी लिखी होकर ऐसी बातें बोलती है। भला माँ भी अपने बच्चे का बुरा चाहती है। यह नज़र बजर कुछ नहीं होती। मौसम बदल रहा है तो बुखार आ गया इसको। और कुछ नहीं है ।"

वो तपाक से बोली। "यार पढ़ी लिखी हूँ पर कुछ ऐसी चीज़ करने में हर्ज़ ही क्या है जिसमें किसी का नुक्सान ना हो और अगर हमारे दिल को शांति मिल जाये तो और क्या चाहिए। मैं भी इन सब में विश्वास नहीं करती पर एक बार try करने में हर्ज़ क्या है। मैंने तो कई बार आजमाया है और कई बार मेरे काम भी आया। "

उसकी इस बात ने मुझे सोच में दाल दिया। बात तो सही है की ऐसे चीज़ करने में हर्ज़ ही क्या है जिससे किसी का नुक्सान नहीं होता। पर एक बात फिर खटक रही थी। अगर कला धागा बांधते वक़्त मेरी नन्ही बिटिया ने मुझसे कारण पूछा तो मैं उसको क्या जवाब दूंगी। क्या ये उसके लिए एक गलत सीख नहीं है? क्या मुझे ऐसा उसके सामने करना चाहिए?

मैं अभी तक इस बात को लेकर असमंजस में हूँ। आप ही बताईये मुझे क्या करना चाहिए?

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Source: theindusparent