कुछ यूं मेरी तीन साल की बेटी खुद ही लिखने लगी

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कई पैरेंट्स दबाव महसूस करते हैं और अपने बच्चों पर लिखने और पढ़ने का जोर देते हैं जबकि वो इसके लिए तैयार भी नहीं होते।

कुछ समय पहले मैंने शेयर किया था कि कैसे मेरी 3 साल की बेटी पढ़ने में दिलचस्पी लेने लगी और घर में खुद पढ़ने के लिए बैठने लगी।

एक और चीज जो पढ़ने के साथ हाथों हाथों ली जाती है वो है लिखना और वो इसे भी खूब इंज्वाय करती है। जैसा कि मैंने पहले भी बताया है कि मैं काफी तनाव मुक्त मां हूं और कभी भी अपने बच्चों पर पढ़ने के लिए बैठने, घंटो पुर्नअभ्यास करने या होमवर्क करने के लिए प्रेशर नहीं डालती। (मेरे बच्चे 4 और 10 साल के हैं।)

मैंने गौर किया कि मेरे बिना प्रेशर डाले, सिर्फ छोटी-छोटी चीजें हर रोज करने से ही कम उम्र में उन्हें पढ़ने और लिखने की खुद ही आदत हो गई।

IMG 20170720 090031189 कुछ यूं मेरी तीन साल की बेटी खुद ही लिखने लगी

She wrote my name ‘Debolina’ herself without asking me, at age 3

कभी बैठकर लिखने नहीं कहा

लिखना और पढ़ना दोनों एक दूसरे से संबंधित है। भारतीय शिक्षा पद्धिती बच्चों को ढाई साल की उम्र में पेंसिल पकड़ने और लिखने को कहती है। कई देशों में बच्चों को लिखने के लिए 6 साल के बाद प्रोत्साहित किया जाता है।

कई पैरेंट्स खुद पर प्रेशर ले लेते हैं और अपने बच्चों पर लिखने और पढ़ने का दबाव डालते हैं जबकि वो इसके लिए तैयार नहीं होते । जो भी स्कूल में हुआ हो लेकिन मैंने कभी बच्चों पर बैठकर लिखने के लिए नहीं कहा। मुझे लगता है कि अगर मैं उन्हें लिखने और पढ़ने के लिए जबरदस्ती करूंगी तो उनकी इससे दिलचस्पी खत्म हो जाएगी।

 
IMG 20170720 090134984 कुछ यूं मेरी तीन साल की बेटी खुद ही लिखने लगी

 

दीवारों को गंदा होने दें

 

जब आपके बच्चे हैं तो घर हमेशा बिखरा और खुशहाल ही रहना चाहिए, ना कि हॉस्पिटल या होटल जैसा साफ, है ना ? हालांकि हमारे घर में बहुत ही अच्छे वॉलपेपर थे लेकिन मुझे लगा कि बेहतर होगा अगर बच्चों को हम दौड़ने और अपनी क्रिएटिविटी दिखाने दें।

मेरी बच्ची क्रेयॉन लेकर दीवार पर अक्षरें लिखती थी और अगर मैं उसे टोकती तो पेपर पर जाकर लिखने की जगह उसकी दिलचस्पी ही खत्म हो जाती। इसलिए बेहतर था कि उन्हें अपने अंदाज में दीवारों को सजाने दिया जाए और उन्होंने वही किया।

 

होमवर्क भी क्रिएटिविटी से कम नहीं

कई बार यह सुनश्चित करने के लिए कि उनके बच्चे ना पीछे छूट जाएं कई पैरेंट्स अधिक तनाव में आ जाते हैं और होमवर्क पर अधिक जोर देते हैं, इस प्रक्रिया में वो बच्चों के दिमाग में डर पैदा करते हैं।

मुझे पता है कि डेडलाइन पर होमवर्क खत्म करना जरूरी है लेकिन क्यों ना इसे एक मजेदार एक्टिविटी के तौर पर लिया जाए?

जब मेरी बेटी घर आती है और दिखाती है उसने क्लास में क्या किया तो मैं हमेशा मुस्कुराती हूं और उन्हें एहसास कराती हूं कि मैं दिलचस्पी ले रही हूं। वो उस समय बिल्कुल टीचर बन जाती है और मुझे पढ़ाने लगती है। जब वो मुझे दिखाती है कि उसे क्या लिखना है तब मैं पूछती हूं कि क्या उसे मेरी मदद की जरूरत है या वो करना चाहती है?

वो हमेशा ये खुद ही करना चाहती है और अगर वो हमेशा परफेक्ट नहीं भी होते हैं, तो भी वो उसके तरीके से होना चाहिए ना कि मेरे।