इस बाल दिवस बच्चों को खेल-खेल में पढाएं नैतिकता का पाठ

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बच्चों को अपराधिक प्रवृतियों से हमेशा के लिए दूर रखने के लिए उनमें क्षमा करने , दया और प्रेम की भावना को बढावा देने में माता-पिता की जिम्मेदारी कहीं अधिक बढ़ जाती है ।  

बच्चों की नैतिक शिक्षा, उनकी सोच और उनका व्यक्तित्व ही हमारा और समूचे देश का कल निर्धारित करता है । बाल दिवस के अवसर पर हमें अपने बच्चों को परफेक्शन की प्रतियोगिता से कुछ पल के लिए बाहर निकाल कर उन्हें विकासशील भारत की सच्ची तस्वीर दिखानी चाहिए ।

जी हां, उन्हें बड़ी ईमारतों, सुंदर पार्क और बेहतरीन माहौल से दूर सड़क के किनारे बसे या झुग्गियों में सिसकते बचपन को दिखाना चाहिए ताकि उन्हें अपने ब्रांडेड कपड़ों की गर्माहट में भी उन फटेहाल कपड़ों में लिपट कर रात बसर करने वाले गरीब और लाचार बच्चों के कष्ट का अनुभव हो सके, उन्हें भूखे बच्चों को देखकर प्लेट में छोड़े आधी रोटी की कीमत समझ आऐगी और इसतरह वो खुद को भाग्यशाली मान कर हमेशा ही सही रास्ते पर चलने और हर तबके के लोगों को सम्मान देने की सीख ले सकेगा ।

हो सकता है कि एक मां के तौर पर आज मेरे शब्द आपको रुखे लगें लेकिन यकींन मानिए हाल के दिनों में जिस तरह का वाकया देखने-सुनने को मिल रहा है (प्रद्युम्न मर्डर केस में नाबालिग आरोपी)उसमें बच्चों को नैतिक मूल्य सिखाने के साथ- साथ उन्हें संवेदनशील बनाने में हम और ये समाज दोनों ही विफल हो रहे हैं ।  

इससे पहले की आपातकाल की स्थिति बन जाए हमें सचेत हो जाना चाहिए ।बच्चों को अपराधिक प्रवृतियों से हमेशा के लिए दूर रखने के लिए उनमें क्षमा करने , दया और प्रेम की भावना को बढावा देने में माता-पिता की जिम्मेदारी कहीं अधिक बढ़ जाती है ।  

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बच्चों के व्यक्तित्व का निर्माण करने के लिए क्या करें    

पैरेंट्स को ध्यान देना होगा कि बच्चों में प्रतिस्पर्धा की भावना बढ़ कर कहीं ईर्ष्या ना बन जाऐ । समय-समय पर आप उनकी कॉन्सिलिंग करते रहें ताकि उन्हें सच्चाई को स्वीकारने में तकलीफ ना हो ।

ध्यान रखें कि बच्चों को ये पता हो की मेहनत करने से सफलता जरुर मिलती है और मेहनत के बावजूद भी जब वो असफल हों या टॉपर ना बन सकें तो उन्हें यह भी बताऐं कि कोई और भी है जिसने उससे भी ज्यादा मेहनत की होगी, उससे भी ज्यादा डिजर्विंग होगा तभी सफल हो सका ।

इसतरह आप उसे सकारात्मक तरीके से बेहतर करने के लिए लगातार प्रेरित कर सकते हैं ।

बच्चों में बदले की भावना नहीं पनपने दें । टीन ऐज में इस बात का ज्यादा ख्याल रखना होगा कि बच्चे अपने सहपाठी की किसी गलती या भूल का बदला लेने की ना सोचे । उन्हें भूल को बिसरा कर आग बढ़ने की सीख दें ।

माफी देना भी एक कला है जिसमें बच्चे को निपुण कराऐं । उन्हें ये सिखाऐं की जो गलती माफ करने में सक्षम है वही श्रेष्ठ है ।

अगर आपके बच्चे बोर्ड ऐग्जाम के करीब हैं या टीन ऐज को पार करने वाले हैं या प्री टीन अवस्था में हैं तो भी आप उसे मोरल लेशन देना शुरु कर सकते हैं । हलांकि बेहतर यही होता है कि बढ़ते बच्चों में जब समझ विकसित होने लगे तब ही आप उसके गीली मिट्टी जैसे व्यक्तित्व को सही समय पर सही आकार दें ।