आपका बच्चा भी जल्दी लिखने लगेगा...बस ट्रेंनिग के लिए अपनाएं ये फार्मूले..

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इससे पहले की आपकी नन्ही सी जान पर बस्ते का बोझ बढ़े, आप 2 से तीन साल की उम्र में ही उसमें लिखने को लेकर दिलचस्पी जगा सकते हैं ताकि आगे चलकर वो जल्दी ही लिखना सीख सके।

जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं उनपर नई चीजें सीखने का दबाब भी बढ़ने लगता है । वो बच्चे जो स्कूल जाने लायक हो चुके हैं या फिर जिनकी स्कूलिंग शुरु हो गई है उनके सामने तो हर दिन कई नई चुनौतियां आती हैं जिसमें से एक है सुंदर, सही और साफ लिखना ।

फिर बच्चे की देखरेख करने के अलावा माता-पिता के पास जो एक नई मुसीबत आ जाती है वो है ‘होमवर्क’ । जी हां, पैरेंट्स भी कम जद्दोज़हद नहीं करते, अपने बच्चे को अव्वल बनाने में एक तरह से उनकी भी स्कूलिंग ही शुरु हो जाती है ।

इससे पहले की आपकी नन्ही सी जान पर बस्ते का बोझ बढ़े, आप 2 से तीन साल की उम्र में ही उसमें लिखने को लेकर दिलचस्पी जगा सकते हैं ताकि आगे चलकर वो जल्दी ही लिखना सीख सके।

मेरा ये लेख उन सभी पैरेंट्स को समर्पित है जो अपने बच्चे पर झुंझलाकर या कभी आंखे दिखा कर उससे सीधा और साफ लिखवाने के लिए खुद भी बराबर मेहनत करते हैं ।

लिखने के लिए बच्चे को कैसे करें तैयार...

सबसे पहले तो ये पता करें कि वो किस हाथ से लिखने में कंफर्टेबल है । अगर बच्चा हर बार, हर काम के लिए अपनी बांयी हाथ का इस्तेमाल कर रहा है तो हो सकता है कि वो आगे चलकर लेफ्टी बने ।

इसमें कोई बुराई तो नहीं है लेकिन फिर भी आपकी इच्छा हो तो उम्र के इसी पड़ाव पर आप उसे दांयी हाथ से लिखने की प्रैक्टिस करवा सकती हैं ।

हाथ की मांसपेशियों में फुर्ती तथा बल लाने के लिए आप उसे मुट्ठी बांधना-खोलना सिखाएं । अपनी देखरेख में उसे कैंची से पेपर कटिंग करने के लिए भी कह सकती हैं । हाथों के मुवमेंट वाले क्रियाकलाप उसके लिए बेहतर होंगे ।   

बैठने के तरीके पर भी गौर करें, यह भी बच्चे की ग्रिप पर असर डालता है ।

अगर बच्चा स्वस्थ हो तो डेढ़ साल की आयु के बाद ही आप उसे पेपर-पेन या पेंसिल से खेलने के लिए दें । इन चीज़ों से दोस्ती समय से पहले हो जाने से बच्चे की लिखने में रुचि अपने आप ही हो जाएगी । ये काम और भी आसान हो जाऐगा जब आप उसके सामने लिखने के लिए पेंसिल-पेपर लेकर बैठें ।

आपको ये जानकर हंसी आऐगी पर मैंने अपने बेटे की दोस्ती किताब-क़ॉपियों से काफी पहले ही करवा चुकी थी या शायद घर के लिखने-पढ़ने वाले माहौल को देखते हुए वो यूं ही किताबें ले कर बैठना सीख गया है ।

पेन-पेंसिल और किताबें उसके लिए खेल के ही ईन्सट्रुमेंट्स हैं...हालांकि किताबों के प्रति उसका ये लगाव कभी-कभी हमारे लिए घाटे का सौदा हो जाता है...वो इसलिए क्योंकि डेढ़ साल की उम्र पार करने से पहले ही वो हमारी कई बेहतरीन किताबें खराब कर चुका है ।

तस्वीरों वाली अपनी किताब लेकर बैठना, स्लेट पर चौक से घिसना, पेन उठाकर डायरी के पन्नों पर घिसना ये सब उसके पसंदीदा खेल हैं । कई बार वो परेशानी बढ़ाता तो है लेकिन मेरी जायज़ नाराज़गी के बाद मुझे इस बात ही खुशी होती है कि खेल-खेल में उसने पेंसिल ठीक तरह पकड़ना सीख लिया है ।

src=https://hindi admin.theindusparent.com/wp content/uploads/sites/10/2017/12/child 2619902 960 720.jpg आपका बच्चा भी जल्दी लिखने लगेगा...बस ट्रेंनिग के लिए अपनाएं ये फार्मूले..

मेरे अनुभव को पढ़कर आप ये समझ सकती हैं कि बच्चे को जिस भाव से आप खिलौना लाकर देती हैं उसी तरह स्लेट, चौक या कलरफुल किताबें, कोई पुरानी डायरी आदि भी दें । ताकि वो जी भर कर इससे खेल सके और इसके इस्तेमाल को समझ सकें ।

ये भी बेहतर होगा कि आप बालू में, मिट्टी में या बड़े ट्रे में आटा डालकर उसमें ऊंगली से आकार बनाने के लिए बच्चे को प्रोत्साहित करें । इसके लिए आप फर्श पर रंगोली के अलग-अलग रंगों का भी प्रयोग कर सकती हैं । इस तरह बच्चे में अलग-अलग आकार को लेकर जिज्ञासा बढ़ेगी और वो लिखने के लिए तैयार होगा।

सिखाने के शुरुआती तरीके...  

  • आप उसकी शुरुआत ‘बिंदु’ बनाने से कर सकती हैं । फिर उसे बढ़ाकर खड़ी रेखा बनाने, टेढ़ी-मेढ़ी रेखा बनाने के लिए सिखाएं । रेखाओं से बनने वाली अनेकों आकार आप ड्रा करवा सकती हैं । इस तरह के शुरुआती अभ्यास के लिए कई हेल्प बुक भी उपलब्ध रहते हैं ।
  • हैंड मुवमेंट के लिए आप पेंसिल पकड़ा कर अभ्यास करवाएं ।
  • गोलाकार ड्रा करने के लिए कहें फिर उसे आधा मिटा कर लेटर बनाएं ।
  • छोटे डॉट्स के मिलान से लेटर बनाने की प्रैक्टिस करवाने में आसानी होगी ।
  • छोटी लाईन-बड़ी लाईन में अंतर बताएं और पेपर पर बनवाएं ।
  • ब्लॉक्स को दिखाकर अल्फाबेट के आकार को समझाएं फिर पेपर या स्लेट पर रेखाओं की मदद से लेटर बनाएं ।
  • आस-पास दिखाई देने वाले चिन्हों को ड्रा करवाएं जैसे सही,गलत या जोड़ का निशान ।
  • आप इस काम के लिए मोबाईल ऐप्स का भी इस्तेमाल कर सकती हैं लेकिन हाथ से लिखना बेहतर होता है ।
  • बच्चे को लगातार प्रोत्साहित करती रहें ताकि उसका आत्मविश्वास बना रहे ।

अंत में सबसे ज़रुरी सुझाव यही देना चाहुंगी कि इस पूरी प्रक्रिया में आपको धैर्यवान बनना होगा । बच्चे अपनी गति से ही आगे बढ़ेंगे क्योंकि वो हमारी तरह ट्रेंड नहीं हैं ।

सब्र रखकर आप उसे अधिक से अधिक प्रयास करवाएं लेकिन उसे खेलने के भी भरपूर मौके दें । पढ़ाने के गलत तौर-तरीके ही सीखने की प्रक्रिया को बोझ बना देते हैं ।

इसलिए सिखाने के लिए वही समय चुनें जब बच्चा बहुत एनरजेटिक हो । अगर आपके पास बच्चे के लिए समय नहीं है तो बच्चे के लिए किसी स्थिर, धैर्यवान और क्रिएटिव टीचर का चुनाव करें ।

इस उम्र में बच्चों को किसी भी प्रकार का प्रेशर देना ठीक नहीं होगा इसलिए आपको अलग-अलग दिलचस्प और रोमांचक तरीके इज़ाद करने होंगे ताकि बच्चे को लिखना ऊबाने वाला काम ना लगे ।